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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

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व्याख्या भाग २६६ सवैया सोई हुती पिय की छतियाँ लगि बाल प्रबीन महा मुद मानै । केस खुले छहरैं वहरैं फहरैं छवि देखत मैन अमानै ॥ वा रस मै रसखानि पगी रति रैन जगी अँखियाँ अनुमानै । चन्द पै विम्ब औ विम्ब कैरव कैरव पै मुकता प्रयानै ॥२२६॥ शब्दार्थ—सोई हुई = सोई हुई थी । मुद = प्रसन्नता । छहरैं = फैले हुए थे । वहरैं फहरैं = बाहर निकलकर हिल रहे थे । मैन = कामदेव अमानै = अमान्य, तिरस्करणीय । चन्द = चन्द्रमा जैसा मुख । बिम्ब = कुँदरु, आँखों की ललाई । कैरव = कुमुद, आँखो के सफेद कोए । मुक्तान = मोतियो के; रात मे जागने के कारण आँस्रओ के । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से अन्य सखी के सुरतान्त का वर्णन करती हुई कहती है कि वह चतुर बाला अत्यन्त प्रसन्नता के साथ अपने प्रिय- तम की छाती से लगाकर सोई हुई थी । उसके खुले हुए केश बाहर निकलकर हिल रहे थे । उसकी शोभा को देखकर कामदेव भी तिरस्करणीय था । प्रिय के साथ आनन्द मे डूबी रहकर रातभर जागने की बात का पता उसकी आँखो से चल रहा था । उसका अलसाया हुआ मुख, लाल आँखे, आँखो के सफेद कोए और रातभर जगाने के कारण जम्भाई के कारण निकले हुए आँसू ऐसे प्रतीत होते थे मानो चन्द्रमा पर बिम्ब, बिम्ब पर कुमुद और कुमुद पर मोती हो । विशेष—प्रतीप और रूपक अलकार । सवैया अगनि अग मिलाइ दोऊ रसखानि रहे लिपटे तरु छाही । संगनि सग अनग को रंग सुर ग सनी पिय दै गलवाही ।। वैन ज्यौ मैन सु ऐन सनेह को लूटि रहे रति अन्तर जाही । नीबी गहै कुछ कंचन कुम्भ कहै वनिता पिय नाही जु नाही ।।२२७।। शब्दार्थ—अनग = कामदेव । रग = प्रेम । सुरग = उन्मादक । ऐन = घर । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से किसी अन्य गोपी के सुरत-शृंगार का वर्णन करती हुई कहती है कि वे दोनो वृक्ष की छाया मे अपने अग से अंग मिला रहे थे । वह नायिका उसके साथ कामदेव के उन्मादक प्रेम मे डूबकर

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