रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०० रसखान-ग्रन्थावली
उसे बाहुपाश मे जकड़े हुए थी। उसके वचन कामदेव के घर जान पडते थे; अर्थात् उसके वचनो से काम-भावना की अभिव्यक्ति हो रही थी। वे दोनो 'रति के अन्तर्गत प्रेम की लूट कर रहे थे। जब उसका प्रिय उसकी नीवी को और कचन कुच-कुम्भो को ग्रहण करता था तो वह वनिता नही नही कर रही थी। विशेष —अनुप्रास, उपमा, रूपक अलकार। तुलना—'हाथन सो गहि नीवी कह्यो पिय, नाही जु नाही जु नाही जु नाही।' —हरिश्चन्द्र सवैया आज अचानक राधिका रूप-निधान सो भेट भई वन माही। देखत दीठि परे रसखानि मिले भरि अंक दियें गलवाही ॥ प्रेम-पगी बतियाँ दुहुँ घाँ की दुहूँ को लगी अति ही चितचाही। मोहिनी मंत्र वसीकर जन्त्र हटा पिय की तिय की नंहि नाही ॥२२८॥ शब्दार्थ —रूप-निधान —सौन्दर्य-भण्डार । रसखानि —आनन्द-सागर कृष्ण। अंक —बाहुपाश। प्रेम-पगी = प्रेमपूर्ण। अर्थ —कोई गोपी अपनी सखी से राधा-कृष्ण के मिलन का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! आज अचानक वन मे राधा और सौन्दर्य-भण्डार कृष्ण की भेट हो गई। आनन्द-सागर कृष्ण ने उसे देखते ही गलवाँही देकर बाहुपाश मे बाँध लिया। दोनो प्रेम-पूर्ण बाते करने लगे, दोनो के मन मे ही मिलन की अत्यन्त प्रबल इच्छा थी। प्रियतम कृष्ण का 'हा हा करना' यदि मोहिनी मन्त्र था तो राधा का 'नही नही करना' वशीकरण मन्त्र था। सवैया वह सोई हुती परजक लली लला लीनों सु आह भुजा भरिकै। अकुलाइ कै चौकि उठी सु डरी निकरी चहै अंकनि ते फरिकै ॥ झटका झटकी मैं फटी पटुका दर की अंगिया मुकता झरिकै। मुख बोल कढे रिस से रसखानि हटी जू लला निविया धरिकै ॥२२६॥ शब्दार्थ —हुती = थी । परजक = पर्यंक । अंकनि ते = भुजाओ मे से । 'पटुका = दुपट्टा । दरकी = फट गई । मुकता = मोती ।