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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग ३०६ अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से अन्य सखी की सुरत का वर्णन करती हुई कहती है कि वह अपने पलंग पर सोई हुई थी कि कृष्ण ने आकर उसे अपनी भुजाओ मे भर लिया । वह आकुल होकर चौंक उठी, डर गई और फड़क कर उसकी गोद से निकलने का प्रयत्न करने लगी । इस भटका भटकी. मे उसका दुपट्टा फट गया, चोली भी फट गई और उसमे से मोती टूटकर नीचे गिर पड़े । रसखान कहते है, तब उसने क्रोधपूर्वक कृष्ण से कहा कि हे कृष्ण ! दूर हट जाओ, मेरी नीवी धडक रही है । विशेष —अनुभावो का सजीव एव स्वाभाविक वर्णन है । सवैया अँखियाँ अँखियाँ सौ सकाइ मिलाइ हिलाइ रिझाइ हियो हरिवो । बतिया चित चोरन चेटक सी रस चारु चरित्रन ऊचरिवो ॥ रसखानि के प्रान सुधा भरिवो अधरान पै त्यौ अधरा धरिवो । इतने सब मैन के मोहिनी जन्त्र पै मन्त्र बसीकर सी करिवो ॥ २३०॥ शब्दार्थ—सकाइ = सकोचपूर्वक । चेटक = जादू । चारु = सुन्दर । ऊचरिवो = उच्चरित करना, कटना । बसीकरण = वशीकरण । सी = सी सी की ध्वनि । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से अन्य सखी के सुख श्रृंगार का वर्णन कहती हुई कहती है कि उसने सकोचपूर्वक अपने प्रियतम की आँखो से अपनी आँखे मिलाई; गर्दन हिलाकर और उसके द्वारा अपने प्रिय को रिझाकर उसने उसका हृदय अपने वश मे कर लिया । चित्त को चुराने वाले चीरो की सी जादू-भरी बाते करके उसने रमणीय आनन्द दिया । अपने प्रिय के अधरो पर अपने अधर रखकर उसने उसके प्राणो मे अमृत उड़ेल दिया । इतने सारे मोहने वाले कामदेव के मन्त्रो को अपनाकर भी उसने सी-सी ध्वनि करके अपने करने प्रियकर वशीकरण मन्त्र डाल दिया । विशेष—यमक, उपमा अलकार । सवैया वागन काहे को जाओ पिया, बैठी ही बाग लगाम दिखाऊं । एडी अनार सी मौरि रही, बरियाँ दोउ चम्पे की डार नवाऊँ ॥