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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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३०२ रसखान-ग्रन्थावली छातिन मैं रस के निबुआ अरु घूंघट खोलि कै दाख चखाऊं । टाँगन के रस के चसके रति फूलनि की रसखानि लूटाऊँ ॥२३१॥ शब्दार्थ—मौरि रही = फूल रही है। दाख = द्राक्षा, अधर । टाँगन = छुहारा । अर्थ—कोई नायिका नायक से कह रही है कि हे प्रियतम ! तुम बाग मे क्यो जाते हो ? मैं घर बैठे ही तुम्हे बाग लगाकर दिखा सकती हूँ। मेरी एडियाँ अनार की भांति फूल रही है, मानो ये ही अनार है। दोनो बाँहे ही मानो चम्पे की डाले है। छाती मे उभरे हुए स्तन ही मानो रस भरे नीबू है । मैं घूंघट खोलकर तुम्हे द्राक्षा चखा सकती हूँ, अर्थात् मेरे अधरो के चुम्बन मे द्राक्षा का आनन्द भरा हुआ है। रसखान कहते हैकि जंग रूपी छुहारो का रस तुम्हे चखा सकती हूँ और प्रेम की कलियाँ तुम पर लुटा सकती हूँ। विशेष—वर्णन मे काव्यात्मकता कम है और सागरूपक की सयोजना का प्रयत्न अधिक है । वियोग-वर्णन सवैया फूलत फूल सबै वन बागन बोलत मौर वसत के आवत । कोमल की किलकार सुनै सब कत विदेसन ते सब धावत ॥ ऐसे कठोर महा रसखान जु नेकहु मोरी ये पीर न पावत । हक सी सालत है हिय मैं जब वैरीन कोमल कूक सुनावत ॥२३२॥ शब्दार्थ—कंत = प्रियतम । हक = वरछी । अर्थ—कोई विरहणी गोपी अपनी सखी से कहती है कि सारे बागो मे फूल खिल गये है। वसन्त के आगमन के कारण भौरे उन पर गूँज रहे है । कोयल की कू-कू सुनकर सबके प्रियतम कृष्ण इतने कठोर है कि मेरी विरह-वेदना की तनिक भी चिन्ता नही करते । जब कोयल बोलती है तो उसकी कूक हृदय मे चरछी के समान लगती है । विशेष—१. उपमा अलकार । २ परम्परागत वर्णन । ३. यह सवैया श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रन्था-वली' मे नही है ।