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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग ३०३ सवैया रसखान सुनाह वियोग के ताप मलीन महा दुति देह तिया की । पकज सौ मुख गौ मुरझाय लगी लपटैं बरै स्वाँस हिया की ॥ ऐसे मे आवत कान्ह सुने हुलसै सुतनी तरकी अँगिया की । यो जन जोति उठी तन की उसकाय दई मनो बाती दिया की ॥२३३॥ शब्दार्थ-सुनाह = प्रियतम । ताप = दुख । पकज = कमल । बरै = जलने लगी । हुलसै = प्रसन्न हुई । सुतनी = दृढ़ डोर । अर्थ-कोई गोपी अपनी सखि से किसी अन्य विरहिणी गोपी के विषय मे कह रही है । वह गोपी अपने प्रियतम के वियोग-दुख से इतनी दुखी थी कि उसके शरीर की शोभा भी मद पड गई थी । उसका कमल-जैसा मुख भी मुरझा गया था । उसके हृदय की साँसे लपट बनकर जलने लगी थी । इसी बीच उसने अपने प्रियतम के आगमन की खबर सुनी । वह इतनी प्रसन्न हुई कि उसकी कचुकी की दृढ़ डोर भी कसमसाने लगी । उसका शरीर इस प्रकार शोभायुक्त हो उठा, मानो दीपक की बत्ती को उकसा दिया गया हो । विशेष-१. उपमा, उत्प्रेक्षा, समाधि अलकार । २ सवैया २०० मे भी यही उत्प्रेक्षा है । ३ यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रन्थावली' मे नही है । सवैया विरहा की जु आँच लगी तन मे तब जाय परी जमुना जल मे । विरहानल तै जल सूखि गयौ मछली बही छाँडि गई तल मे ॥ जब रेत फटी रु पताल गई तब सेस जर यौं धरती-तल मे । रसखान तबै इहि आँच मिटै जब आय कै स्याम लगै गल मे ॥२३४॥ शब्दार्थ - विरहानल = वियोग की आग । धरती-तल-पाताल लोक । आँच मिटै = दुख दूर होगा, ज्वाला शान्त होगी । अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से अन्य विरहिणी गोपी का वियोग-दुख वर्णन करती हुई कहती है जब उसके शरीर मे वियोग-दुख की आग बढ गई तो वह उसे शान्त करने के लिए यमुना जल मे कूद गई । तब विरह की आग के कारण यमुना का जल सूख गया और मछलियाँ जल के अभाव के कारण