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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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३०४ रसखान ग्रन्थावली यमुना के तल मे बैठ गई। उस आग के कारण जब यमुना का जल अत्यन्त गर्म हो गया तो उसकी गरमी से पाताल-लोक मे स्थित शेषनाग भी जलने लगा। रसखान कहते है कि यह ज्वाला तभी शात हो सकती है जब कृष्ण, उसके गले से आकर लगेगे। विशेष-१. अहात्मकता के कारण भाव-शून्यता । २. यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान ग्रन्थावली' मे नही है। तुलना - 'प्यारी कौ परसि पौन गयो मानसर पँह, लागत ही औरे गति भई मानसर की। जलचर जरे औ सिवार जरि छार भयौ, जल जरि गयो पक सूख्यो भूमि दरकी।' —गग कवि, सवैया बाल गुलाब के नीर उसीर सो पीर न जाइ हियैं जिन ढारौ । कज की माल करौ जु बिछावत होत कहा पुनि चंदन गारौ ॥ एते इलाज विकाज करौ रसखानि को काहे को जारे पै जारौ । चाहत हौ जु जिवायौ भटू तौ दिखावौ बडी बड़ी आँखिनिवारी ॥२३५॥ शब्दार्थ-गुलाब के नीर = गुलाब जल । उसीर = खस । गारौ = लेप । विकाज = व्यर्थ । भटू = सखी । अर्थ - कोई विरह-व्याकुल गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखी ! मेरे हृदय मे गुलाबजल और खस छिडकना बेकार है। कंजमाला का बिछावन करने से तथा चंदन का लेप करने से भी कोई लाभ नही है। ये सारे उपचार व्यर्थ है, वरन् ये तो मेरी जलन को और अधिक बढ़ाते है। हे सखि ! यदि तुम मुझे जीवित रखना चाहती हो तो मुझे विशाल नेत्र वाले कृष्ण का दर्शन करा दो। विशेष-वर्णन परम्परागत है । सवैया काह कहूँ रतियाँ की कथा बतियाँ कहि आवत है न कछू री । आइ गोपाल लियौ भरि अंक कियौ मनभायौ पियो रस कू री ॥

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