भारतकोश
रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 368 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 322

व्याख्या भाग ३०५.

ताहि दिना सो गडी अँखियाँ रसखानि मेरे अंग अंग मैं पूरी । पै न दिखाई परै अब बावरी दै कै वियोग विथा की मजूरी ॥२३६॥ शब्दार्थ—रतियाँ की = रात की । अंक = गोद । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से अपनी-विरह व्यथा का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! मैं रात की बाते तुमसे क्या कहूँ ? वे बाते तो कहने मे ही नही आती । कृष्ण ने मुझे अपनी गोद मे भर लिया, उसने अपनी मनोकामना पूरी की, और रस का पान किया । उसी दिनसे उस आनन्द-सागर की आँखे पूर्णतया मेरे अंग-अंग मे गडी हुई है, अर्थात् मैं उनकी शोभा को तनिक देर के लिए भी नही भूल पाती । किन्तु हे सखि ! वियोग-व्यथा को मजदूरी रूप मे देकर वह कृष्ण अब दिखाई नही पड़ता । विशेष—१. परम्परागत वर्णन है । २. 'बावरी' शब्द आत्मीयता का सूचक है । कवित्त काह कहूँ सजनी सँग की रजनी नित बीतै मुकुन्द कोटे री । आवन रोज कहै मनभावन आवन की न कबौ करी फेरी । सौतिन-भाग बढ़्यौ ब्रज मै जिन लूटत हैं निसि रंग घनेरी । मो रसखानि लिखी बिधना मन मारिकै आयु बनी हौ अहेरी ॥२३७॥ शब्दार्थ—मुकुन्द = कृष्ण । रंग = आनन्द । विधिना = ब्रह्मा । अहेरी = शिकारी । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से सपत्नी-भाव को प्रकट करती हुई कहती है कि हे सजनी ! मै तुमसे अपनी व्यथा किस प्रकार प्रकट करूँ ? सारी रात कृष्ण की बाट देखते-देखते ही बीत जाती है । मनभावन कृष्ण रोजाना मेरे पास आने को कहते है, लेकिन उनकी मेरे यहाँ आने की कभी बारी ही नही आती । आजकल तो ब्रज मे वह सौत ही बहुत भाग्यशाली है जो कृष्ण के साथ रात को अत्यधिक आनन्द का भोग करती है । रसखान कहते है कि मेरे भाग्य मे तो ब्रह्मा ने यही लिखा है कि मै अपने-आपको मारने के लिए स्वयं ही अपनी शिकारी बनी हुई हूँ । सवैया आये कहा करि कै कहिए वृपमान लली सो लला दृग जोरत । ता दिन तें अँसुवान की धार रुकी नही जद्यपि लोग निहोरत ।