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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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६०६ रसखान-ग्रन्थावली वेगि चलो रसखान वलाइ लौं क्यो अभिमानन भौंह मरोरत । प्यारे । पुरन्दर होय न प्यारी अबै पल आधिक मे ब्रज बोरत ॥२३८॥ शब्दार्थ—निहोरत = समझाते हैं । वलाइ ली = बलैया लेती हूँ । पुरन्दर = इन्द्र । पल आधिक मे = एकआध पल मे । बोरत = डुबोना । अर्थ—राधा की कोई सखी कृष्ण को समझाती हुई कहती है कि हे कृष्ण ! तुम यह तो बताओ कि राधा से अपनी आँखे मिलाकर तुम उस पर क्या जादू कर आये हो, क्योकि उसी दिन से उसकी आँसुओ की धारा रुकी नही है, यद्यपि लोग उसे बहुत समझाते हैं । हे आनन्द-सागर कृष्ण ! जल्दी चलो, मै तुम्हारी बलैया लेती हूँ, क्यो अभिमान करके तुम रुक रहे हो । हे प्यारे ! यदि तुम नही चले तो वह विरहिणी राधा अपने आँसुओ मे एक-आध पल मे ही इन्द्र बनकर सारे ब्रज को डुबो देगी । विशेष—१. एक वार इन्द्र ने ब्रज-वासियो से रुष्ट होकर समूचे ब्रज को डुबा देने का सकल्प किया और मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी तब कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजकी रक्षा की । इस सवैया की अतिम पक्ति मे इसी कथा की ओर सकेत है । २. 'पुरन्दर होय न प्यारी' का एक अर्थ यह भी हो सकता है— राधा को इन्द्र मत समझो, क्योकि इन्द्र से तो तुमने गोवर्धन उठाकर ब्रज की रक्षा कर ली थी, पर राधा से किसी प्रकार भी उसे नही बचा पाओगे । ३. श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रन्थावली' मे यह सवैया नही है । तुलना—१ 'सखी इन नैननि तै घन हारे । बिनही रितु बरषत निति वासर, सदा मलिन दोउ तारे ऊरध स्वास समीर तेज अति, सुख अनेक द्रुम डारे वदन सदन कहि बसे वचन-खग, दुख पावस के मारे । दुरि दुरि बूँद परत कंचुकि पर, मिलि अंजन सौ कारे । मानौ परनकुटी सिव कीन्ही, बिवि मूरति धरि न्यारे । घुमरि घुमरि वरषत जल छाँडत, डर लागत अँधियारे । बूडत ब्रजहिं सूर को राखै, बिनु गिरवरधर प्यारे ॥'