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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग ३०७ २. 'कहु रहीम उत जाय कै, गिरधारी सो टेरि। अब दृग जल भरि राधिका, जहि डुबावत फेरि ॥' —रहीम ३. 'लाडिली के अँसुवान को सागर, बाढ़त जात मनो नभ छूवे है। बात कहा कहिए ब्रज की अब, बूडोई ह्वै है कि बूढ़त ह्वै है ॥' —रघुनाथ ४. 'जानि ब्रज बूडत जू होते गिरिधारी तौ पे, ब्रज मे बढ़ौते दुख-सोते कहो काहे के।' —द्विजदेव सवैया गोकुल के विछुरे को सखी दुख प्रान ते नेकु गयौ नही काढ्यौ । सो फिर कोस हजार ते आय कै रूप दिखाय दधे पर दाघ्यौ । सो फिर द्वारिका ओर चले रसखान है सोच यहै जिय गाढ्यौ । कौन उपाय किये करि है ब्रज मे बिरहा कुरुखेत को बाढ्यौ ॥२३६॥ शब्दार्थ—गोकुल के बिछुरे को=गोकुल गाँव त्यागने का। दधे पर दाघ्यौ=जले हुए को और जलाया। कुरुखेत को बाढ्यौ=कुरुक्षेत्र मे दिये गये दान के समान बढ़ता ही जाता है। (पुराणो मे बताया गया है कि कुरुक्षेत्र मे किया गया दान आदि १३ दिन तक प्रतिदिन १३ गुनी वृद्धि को प्राप्त करता है। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! अभी तक गोकुल गाँव से बिछुड़ने का दुख ही अपने मन से नही निकाला गया था कि बहुत दूर से कृष्ण ने आकर अपना सौन्दर्य दिखाकर हमे जले हुओ को और जलाया अपने प्रेम-पाश मे बाँधकर वे फिर द्वारिका को चले गये। हमारे मन मे अब यही दुख है कि ब्रज मे कुरुक्षेत्र मे दिये गये दान के समान नित्यप्रति बढ़ते हुए इस विरह-दुख को किस प्रकार मिटाया जा सकता है। विशेष—१. रूपक अलकार। २. यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित रसखान ग्रंथावली मे नही है।