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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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३०८ रसखान-ग्रन्थावली तुलना—विरह भरेयो कर आँगन कोने । दिन दिन बाढत जात सखी री, ज्यों कुरुखेत के डारे सोने ॥' —सूरदास सवैया गोकुल नाथ वियोग प्रलै जिमि गोपिन नद जसोमति जू पर । वाहि गयी अँसुवान प्रवाह भयौ जल मे ब्रजलोक तिहू पर ॥ तीरथराज सी राधिका प्रान सु तो रसखान मनौ ब्रज भू पर । पूरन ब्रह्म ह्वै ध्यान रह्यौ पिय औधि अखैबट पात के ऊपर ॥२४०॥ शब्दार्थ—प्रलै=प्रलय तीरथराज=प्रयाग, प्रयाग के समान पवित्र । औधि=अवधि । अखैवट=अक्षयवट, इस वृक्ष का प्रलयकाल मे भी नाश नही होता। अर्थ—कोई गोपी अपनो सखी से कहती है कि कृष्ण के वियोग का दुख गोपियो, नद और यशोदा पर प्रलय का रूप धारण कर चुका है। इनके वियोगजन्य आँसुओ के प्रवाह मे ब्रजलोक जल मे बह गया है। प्रयाग के समान पवित्र राधा के प्राण ही समूचे ब्रज में इस धरती पर बच पाये है और वह भी इसलिए कि वह अपने पूर्ण ब्रह्म प्रियतम के ध्यान मे उनके आगमन की अवधि भी गिनती हुई अक्षयवृक्ष के पत्तो पर चढ गई है । विशेष—१. उपमा, अतिशयोक्ति अलकार । २. ऊहात्मकता के कारण भावो को क्षति । ३. यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान ग्रन्थावली' मे नही है । सवैया ए सजनी जब ते मैं सुनी मथुरा नगरी बरषा रितु आई । लै रसखान सनेह की ताननि कोकिल मोर मलार मचाई ॥ साँझ ते भोर लौ भोर ते साँझ लौ गोपिन चातक ज्यौ रट लाई । एरी सखी कहिये तो कहाँ लगि वैर अहीर ने पीर न पाई ॥२४१॥ शब्दार्थ—सनेह की ताननि=प्रेमपूर्ण स्वरो मे । साँझ ते भोर लौ भोर ते साँझ लो—सन्ध्याकाल से प्रात काल तक और प्रात काल से सन्ध्याकाल तक । कहाँ लगि=कहाँ तक । बैरी=शत्रु; आत्मीयता=सूचक सम्बोधन । पीर न पाई=पीड़ा का अनुभव नही हुआ ।