रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
पृष्ठ 326, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग ३०६ अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सजनी ! जब से मैंने यह सुना है कि मथुरा नगरी मे वर्षाऋतु आ गई है और कोयल तथा मोर प्रेम के स्वरो मे बोलने लगे है, तब से हर समय गोपियाँ चातक की भाँति पी-पी पुकार रही है । लेकिन हे सखि ! यह तो बताओ कि उस बैरी अहीर को (कृष्ण को) इन गोपियो की विरह-वेदना का कहाँ तक अनुभव हुआ है; वह तो अत्यन्त निष्ठुर और पाषाण-हृदय है । विशेष—१. प्रकृति का उद्दीपन रूप मे परम्परागत वर्णन । २. उपमा अलंकार । ३ यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रन्थावली' मे नही है । सवैया मग हेरत धूं धरे नैन भए रसना रट वा गुन गावन की । अगुरी गनि हार थकी सजनी सगुनौती चलै नहि पावन की । पथिकी कोउ ऐसो जु नाहिं कहै सुधि है रसखान के आवन की । मनभावन आवन सावन मे कही औधि करी डग वावेन की ॥२४२॥ शब्दार्थ—मग हेरत=रास्ता देखते हुए । धूँ धरे = धुंधले । रसना = जीभ । सगुनौती = शुभ शकुन । औधि = आने की अवधि । डग वावेन की = वामनावतार के डगो की भाँति निरन्तर बढती हुई । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से अपनी विरहा 'वस्था का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! प्रियतम कृष्ण का रास्ता देखते हुए मेरे नेत्र धुंधले पड़ गये हैं; उसके गुणो का गान करती-करती जीभ थक गई है । उसके आने के दिनो को गिनती-गिनती अगुलियाँ थक गई है, लेकिन उनके आने का कोई भी शुभ शकुन प्राप्त नही होता । कोई भी ऐसा पथिक नही आता जो कृष्ण के आगमन का समाचार दे । कृष्ण सावन के महीने मे आने की कह गये थे, पर अभी तक नही आये । उनके आने की अवधि तो वामनावतार की तरह निरन्तर, बढती ही जा रही है । विशेष—१. उपका अलंकार । २. विरह का परम्परागत वर्णन । ३ यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-