भारतकोश
रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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३१० रसखान-ग्रन्थावली ग्रन्थावली' मे नही है । तुलना—1 'बीती औधि आवक की लाल मनभावन की, डग भई बावन की सावन की रतियाँ ।'—सेनापति 2. 'बावन को डग यौ बिरहा जु ग्रहो मन भावन सावन आयी ।' —अज्ञात ' सपत्नी-भाव सवया वा रसखानि गुनौ सुनि कै हियरा सत टूक ह्वै फाटि गयौ है । जानति है न कछू हम ह्याँ उनवाँ पढ़ि मन्त्र कहा धौ दयौ है । साँची कहै जिय मै निज जानि कै जानति है जस जैसो लयौ है । लोग लुगाई सबै ब्रज माँहि कहैं हरि चेरी को चेरो भयौ है ॥२४३॥ शब्दार्थ—गुनौ=गुणो को । सत=सौ । कहा धौ=न जाने क्या । जस=यश । चेरी को=दासी कुब्जा का । चेरो=सेवक । अर्थ—गोपियाँ कुब्जा के प्रति ईर्ष्या भाव दिखाती हुई उद्धव से कहती है कि हे उद्धव ! उस आनन्द-सागर कृष्ण के गुणो को सुनकर हमारा हृदय सौ- सौ टुकड़े होकर फट गया है । हम नही जानती कि कौन-सा मन्त्र पढकर कुब्जा ने कृष्ण पर चला दिया है । हम अपने मन मे विचार कर यह बात सत्य कहती हैं और जानती हैं कि कृष्ण ने इस प्रकार से कितना यश प्राप्त किया है ? अर्थात् वे बहुत बदनाम हो गये है, क्योकि ब्रज के सब नर-नारी यह कहते हैं कि कृष्ण कुब्जा दासी के दास बन गये है । विशेष—काकुवक्रोक्ति अलंकार । सवैया जानै कहा हम मूढ सबै समझीन तबै जबही बनि आई । सोचत है मन ही मन मै अब कीजै कसा बनियां जु गँवाई ॥ नीचो भयौ ब्रज को सब सीस मलीन भई रसखानि दुहाई । चेरी को चेटक देखहु ही हाई चेरो कियौ धौ कहा पढि मोई ॥२४४॥