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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग ३११ शब्दार्थ—जबही बनि आई—अवसर था। चेरी को—कुब्जा को । चेटक—जादू । अर्थ—गोपियाँ उद्धव के निर्गुण ब्रह्म के उपदेश को सुनकर बहुत दुखी होती है और परस्पर कहती है कि हम मूर्ख कुछ भी नही जानती, इसीलिए जब अवसर था, तभी हम अपने कर्तव्य को नही समझ सकी, अर्थात् जब कृष्ण ब्रज छोड़कर जा रहे थे, तभी उन्हे रोक लेना था। अब मन ही मन यह सोचती है कि जो बाते हो चुकी, उनके विषय मे कुछ कहना-सुनना व्यर्थ है। इस घटना से सारे ब्रज-वासियों का सिर झुक गया और सारी प्रार्थनाएँ व्यर्थ सिद्ध हो गईं। हे सखि ! उस कुब्जा का जादू तो देखो जिससे उसने कृष्ण को अपना दास बना लिया है। न जाने वह जादू उसने कहाँ पढ़ा है। सवैया काइ सौ 'माई कहा करियै सहियै सोई जो रसखान सहावै । नेम कहा जब प्रेम कियौ तब नाचियै सोई जो नाच नचावै ॥ चाहत है हम और कहा सखि क्यो हूँ कहूँ पिय देखन पावै । चेरियै सौ जु गुपाल रुच्यौ तौ भलौ ही सबै मिलि चेरी कहावै ॥२४५॥ शब्दार्थ—नेम—नियम । रूपौ—अनुरूप हो गया । अर्थ—गोपियाँ परस्पर कहती है कि हे सखी ! किससे अपने मन की व्यथा कहे। आन्द-सागर कृष्ण ने जो दुख दिया है, अब तो उसे सहन करने के अतिरिक्त और कोई सहारा नही है। जब कृष्ण से प्रेम किया है तो फिर नियम आदि का स्थान भी क्या रह गया है। जिस प्रकार वह नचाये उसी प्रकार नाचना होगा। हे सखि ! हम और नहीकुछ चाहती । हम तो केवल यही चाहती हैकि किस प्रकार कृष्ण के दर्शन कर सके । यदि कृष्ण दासी के वश मे ही होते है व(यो कि वे कुब्जा के वश मे हो गये है,) तो चलो और सब मिलकर उनकी दासी बन जाओ । तुलना—१. 'चेरी ही सो जो पै रुचि रावही बढी है तो तो, आओ ब्रजनाथ ब्रज हम सब चेरी है।' —नाथ २ 'दासी सो जो साँवरो उद्धव तो हमहूँ चलदासी बनेगी।' —रसनायक