रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१२ रसखान-ग्रन्थावली सवैया भेती जु पै कुवरी हयाँ सखी भरी लातन मूका वकोटती लेती । लेती निकारि हिये की सबै नक छेदि कै कौटी पिराइ कै देती ॥ देती नचाई कै नाच वा रांड कौ लाल रिझावन को फल सेती । सेती सदा रसखानि लिये कुवरी के करेजनि सूलसी भेती ॥२४६॥ शब्दार्थ — भेती = होती । बकोटती लेती = चोट लेती । अर्थ — कुब्जा के प्रति आक्रोश दिखाती हुई कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! यदि यहाँ पर वह कुब्जा होती लात-घूँसे मारकर उसे मोह लेती । अपने हृदय का सारा गुस्सा लेती और उसकी नाक को छेद कर उसमे कौडी पहिना देती । उस रांड को मै नाच नचा देती और कृष्ण कोई रिझाने का फल देती । इस प्रकार मैं सदैव आनंद-सागर कृष्ण की सेवा करती जिससे कुब्जा के हृदय मे मैं सदैव कांटे की भाँति कसकती रहती । विशेष — १. मुक्त पदग्रहय यमक । २ नारी-पन के आक्रोश का स्थान का स्वाभाविक चित्रण । तुलना — 'नीच जाति लांडी जाको बेसर सो काम कहा, दोऊ ओर छेद नाक कौडी एक डारती । दांतनि सो काटि काटि लातन सो मारि मारि, कुब्जा को कूबरी करेजो हों निकारती । —अज्ञात कुवलियापीड-वध सवैया कंस के क्रोध की फैलि रही सिगरे ब्रजमंडल माँझ फुकार सी । आइ गए कछनी कछिकै तबही नट-नागर नंदकुमार-सी ॥ द्वैरद को रद खैंचि लियो रसखानि हिये माहि लाइ विमार सी । लीनी कुठोर लगी लखि तोरि कलक तमाल ते कीरति-डार सी ॥२४७॥ शब्दार्थ — फुकार = फुफकार । द्वैरद = हाथी, कुवलिया पीड । रद = दाँत अर्थ — इस सवैया मे कवि कुवलयापीड के वध का वर्णन करता हुआ कहता है कि कंस के क्रोध की आग सारे ब्रज मे फुफकार की तरह फैल रही थी और उसने कृष्ण को मरवाने के लिए कुवलयापीड से उनका युद्ध निश्चित