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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

३१२ रसखान-ग्रन्थावली सवैया भेती जु पै कुवरी हयाँ सखी भरी लातन मूका वकोटती लेती । लेती निकारि हिये की सबै नक छेदि कै कौटी पिराइ कै देती ॥ देती नचाई कै नाच वा रांड कौ लाल रिझावन को फल सेती । सेती सदा रसखानि लिये कुवरी के करेजनि सूलसी भेती ॥२४६॥ शब्दार्थ — भेती = होती । बकोटती लेती = चोट लेती । अर्थ — कुब्जा के प्रति आक्रोश दिखाती हुई कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! यदि यहाँ पर वह कुब्जा होती लात-घूँसे मारकर उसे मोह लेती । अपने हृदय का सारा गुस्सा लेती और उसकी नाक को छेद कर उसमे कौडी पहिना देती । उस रांड को मै नाच नचा देती और कृष्ण कोई रिझाने का फल देती । इस प्रकार मैं सदैव आनंद-सागर कृष्ण की सेवा करती जिससे कुब्जा के हृदय मे मैं सदैव कांटे की भाँति कसकती रहती । विशेष — १. मुक्त पदग्रहय यमक । २ नारी-पन के आक्रोश का स्थान का स्वाभाविक चित्रण । तुलना — 'नीच जाति लांडी जाको बेसर सो काम कहा, दोऊ ओर छेद नाक कौडी एक डारती । दांतनि सो काटि काटि लातन सो मारि मारि, कुब्जा को कूबरी करेजो हों निकारती । —अज्ञात कुवलियापीड-वध सवैया कंस के क्रोध की फैलि रही सिगरे ब्रजमंडल माँझ फुकार सी । आइ गए कछनी कछिकै तबही नट-नागर नंदकुमार-सी ॥ द्वैरद को रद खैंचि लियो रसखानि हिये माहि लाइ विमार सी । लीनी कुठोर लगी लखि तोरि कलक तमाल ते कीरति-डार सी ॥२४७॥ शब्दार्थ — फुकार = फुफकार । द्वैरद = हाथी, कुवलिया पीड । रद = दाँत अर्थ — इस सवैया मे कवि कुवलयापीड के वध का वर्णन करता हुआ कहता है कि कंस के क्रोध की आग सारे ब्रज मे फुफकार की तरह फैल रही थी और उसने कृष्ण को मरवाने के लिए कुवलयापीड से उनका युद्ध निश्चित

व्याख्या भाग ३१३ कर दिया था । उससे युद्ध करने के लिए कृष्ण कछनी बाँध कर आ गये । रसखान कहते है कि उन्होने अपने मन मे विचार कर के उस हाथी का दाँत 'लिया और उन्होने उसे तमाल की डाली की भाँति तोड दिया । कृष्ण का यह कार्य ऐसा प्रतीत हुआ मानो उन्होने कलकरूपी तमाल वृक्ष जैसे तुच्छ स्थान पर लगी कीर्तिरूपी शाखा को तोड दिया हो । विशेष—उत्प्रेक्षा अलंकार । पाठान्तर—'इस सवैया की तृतीय पंक्ति का यह रूप भी मिलता है 'रद्द दुरद्द को ऐंच लियौ रसखान यहै, मन आइ विचार सी ।' उद्धव-उपदेश सवैया जोग सिखावत आवत है वह कौन कहावत को है कहाँ को । जानति है वर नागर है पर नेकहु भेद लख्यौ नहिं ह्वाँ को ॥ जानति ना हम और कछू मुख देखि जियैं नित नन्दलला को । जात नही रसखानि हमै तजि राखनहारी है मोरपखा को ॥२४८॥ शब्दार्थ—वर = श्रेष्ठ । नन्दलला = कृष्ण । अर्थ—निर्गुण ब्रह्म का उपदेश देने के लिए आए हुए उद्धव को देख कर गोपियाँ परस्पर कहती है कि योग की शिक्षा देता हुआ जो व्यक्ति आ रहा है, -यह कौन है ? उसका क्या नाम है ? कहाँ वह रहता है ? यद्यपि हम जानती है कि वह कोई श्रेष्ठ आदमी है, तथापि इसका हमको तनिक भी भेद (परिचय) ज्ञात नही है । यह चाहे कितना ही योगोपदेश करे, पर हम तो इसके अतिरिक्त और कुछ नही जानती कि हम नित्य कृष्ण के दर्शन करके ही जीवित रहती हैं, रसखान कहते हे कि कृष्ण हमसे नही त्यागे जाते, क्योकि वे मोर मुकुटधारी कृष्ण ही हमारे रक्षक है । सवैया अंजन मंजन त्यागौ अली अँग धारि भभूत करौ अनुरागै । आपुन भाग करयौ सजनी इन बावरे ऊधो जू को कहाँ लागै ॥ चाहै सो और सबै करियै जु कहै रसखान सयानप आगै । जो मन मोहन ऐसी बसी तो सबै री कहौ मुख गोरस जागै ॥२४६॥ शब्दार्थ—अंजन मंजन = श्रृंगार । करौ अनुरागै = प्रेम करो । सयानप =

३१४ रसखान-ग्रन्थावली चतुराई। गोरख जागै = गोरखपंथी 'गोरख जागै' का नाद किया करते हैं। अर्थ — गोपियाँ उद्धव के उपदेश का परिहास करती हुई कहती हैं कि हे सखि ! अब श्रृंगार करना छोड़ दो और भस्म से प्रेम करके उसे ही अपने अंगों पर धारण करो। हे सजनि ! जब हमारे भाग्य में कृष्ण की प्रीति लिखी हुई है तो इस पागल उद्धव को क्यों ईर्ष्या होती है। इस चतुराई के आगे, और चाहे हम कुछ भी कर लें, पर जब हमारे हृदय में कृष्ण बसा हुआ है तो उसकी प्रीति हमसे नहीं छूट सकती। इस पर भी यह उद्धव कहता है कि हम सब कृष्ण की प्रीति छोड़ कर 'गोरख जागे' का नाद करती रहें। विशेष — यह सवैया श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रन्थावली में नहीं है। सवैया लाज के लेप चढ़ाइ कै अंग पची सब सीख को मन्त्र सुनाइ कै। गारुडू ह्वै ब्रज लोग भक्यौ करि औषद बेसक सौंह दिखाइ कै।। ऊधो सौं रसखानि कहै जिन चित्त धरौ तुम एते उघाइ कै। कारे बिसारे को चाहें उतरयौ अरे विख बावरे राख लगाइ कै ॥२५०॥ शब्दार्थ — पची = कोशिश की। गरुड = साँप का विष उतारने वाला। बेसक — उत्तमोत्तम। कारे = कृष्ण को। विख = विष। अर्थ — उद्धव से निर्गुण ब्रह्म का उपदेश सुनकर गोपियाँ उससे कहती हैं कि हे उद्धव ! हम सबने लाज का लेप अपने अंगों पर लगाने की कोशिश की, सभी प्रकार के मन्त्र सुनाए, ब्रज के लोग गरुड बन कर भी थक गये, सौगन्ध दिला कर उत्तमोत्तम औषधियाँ खाई, पर इतने उपाय करने पर भी हमारा कृष्ण प्रेम रूपी विष नहीं उतर सका, अर्थात् हम कृष्ण को नहीं छोड़ सकीं। हे कारे ! तुम उसी विषैले नाग रूपी कृष्ण का विष योग की भस्म से उता- रना चाहते हो ? कहने का भाव यह है कि जब इतने अधिक उपाय करने पर भी हम कृष्ण प्रेम से वियुक्त नहीं हुई तो तुम्हारा योगोपदेश भी यहाँ पर कोई कार्य नहीं करेगा। तुलना — १. सांवरे सांप डसीहै सबें तिन्है ज्ञान सो मूढि उतारै कहा बिस' ब्रजनिधि २ 'स्याम वियोग तैं उद्धव जू छतियाँ फटी ता में मयूप भरो जु।' —सोमनाथ.

व्याख्या भाग ३१५. सवैया सार की सारी सो पारी लगै धरिबे कहँ सीस बघम्बर पैया । हाँसी सो दासी सिखाइ लई है वेई जु वेई रसखानि कन्हैया ॥ जोग गयौ कुबजा की कलानि मै री कब ऐहै जसोमति मैया । हाहा न ऊधौ कुढाओ हमे अब ही कहि दै ब्रज बाजै बधैया ॥२५१॥ शब्दार्थ —सार=लोहा । बाघम्बर=वाघ की खाल । पैया=पाया हुआ । अर्थ—उद्धव का निर्गुण गुरु का उपदेश सुनकर गोपियाँ उससे कहती हैं कि हे उद्धव ! तुम हमे सीस पर बाघम्बर धारण करने को कहते हो, पर वह बाघम्बर हमे लोटे की साडी से भी भारी लगता है । जिसमे हसी-हँसी मे कुब्जा को अपने वश मे कर लिया है, वे ही—केवल वे ही हमारे आनन्द सागर कृष्ण है । तुम्हारा योग तो कुब्जा की चतुरता मे दब गया । हे उद्धव ! हमे बहुत दुख है । तुम हमे अधिक दुखी न करो । हम अभी कह देती हैं कि ब्रज मे बधाई के वाजे बाजे । ब्रज-प्रेम सवैया या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहुँ पुर को तजि डारौ । आठहु सिद्ध नवौ निधि को सुख नन्द की गाइ चराइ बिसारौ ॥ ए रसखानि जबै इन नैनन ते ब्रज के वन बाग तडाग निहारौ । कोटिक ये कलधौत के धाम करील की कुन्जन ऊपर वारौ ॥ २५२ ॥ शब्दार्थ—वा=उस । लकुठी=लाठी । तिहुँ पुर को=तीनो लोको को । सिद्ध=अलौकिक शक्ति, सिद्धियाँ आठ मानी गई है—अणिमा, महिमा, गरिमा लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और कशित्व । अणिमा सिद्धि से योगी अणुरूप धारण करके अदृश्य हो जाता है । महिमा सिद्धि से योगी अपने देह का चाहे जितना विस्तार कर सकता है । गरिमा सिद्धि से योगी अपने शरीर का चाहे जितना भार बढ़ा सकता है । लघिमा सिद्धि से योगी चाहे जितना छोटा और हलका हो सकता है । प्राप्ति सिद्धि से प्रत्येक पदार्थ प्राप्त किया जा सकता है । प्राकाम्य सिद्धि से योगी जो चाहता है, वही हो जाता है । ईशित्व सिद्धि- के बल पर दूसरो पर प्रभुत्व किया जा सकता है । वाशित्व के सिद्धि के बल पर चाहे जिसको वश मे किया जा सकता है । निधि=अपूर्व वैभव,.

३१६ रसखान-ग्रन्थावली निधियाँ नौ मानी गई हैं—पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील और खर्व । कोटिक=करोडो । कलधौत के धाम=सोने चाँदी के महल । ये=सांसारिक प्रभुता के प्रतीक । अर्थ —द्वारिका मे रह कर कृष्ण को ब्रज की याद आ गई है । वे व्यथित होकर रुक्मणी से कह रहे है कि उस लाठी और कामरी के लिए मै तीनो लोक का राज्य एक दम छोड देने को तैयार हूँ, नन्द की गय चराने के लिए अणिमा आदि आठो सिद्धियो के तथा पद्म आदि नवो निधियो के सुख का त्याग करने को उद्यत हू । जब से मैंने अपनी इन आँखो से ब्रज के वन और तालाबो को देखा है अर्थात् मुझे उनकी याद आई है, तब से मैं उसके लिए इतना आतुर हो गया हूँ कि मै वैभव के प्रतीक इन करोडो सोने चादी के महलो को ब्रज के करील कुंजो के ऊपर न्यौछावर करता हूँ । विशेष --'ब्रज के वन-बाग' और 'करील की कुंजन' मे छेकाप्रप्रास है । पाठान्तर—ए रसखानि कबौ इन आँखिन सों ब्रज के बान बाग तडाग निहारो ।' कोटि कई कलधौत के धाम करील की कुंजन ऊपर वारौ ।" कवित्त ग्वॉलन संग जैबौ वन ऐबौ सु गायन संग, हेरि तान गैबो हा हा नैन कहकत हैं । ह्वाँ के गज मोती माल वारो गुंज मालन पै, कुंज सुधि आये हाय प्रान धरकत हैं ॥ गोबर को गारौ सु तो मोहि लागै प्यारौ कहा, भयौ मौन सोने के जटिल मरकत हैं । मंदर ते ऊँचे यह मंदिर है द्वारिका के, ब्रज के खिरक मेरे हिय खरकत है ॥२५३॥ शब्दार्थ—जैबौ = जाना। ऐबौ = आना । हेरि = देखकर । गैबो = गाना । जटिल मरकत = रत्नो से जडे हुए । मंदर = मदराचल । खिरक = गोशाला । अर्थ—ब्रज का स्मरण आने पर कृष्ण रुक्मणी से अपने ब्रज प्रेम को व्यक्त करते हुए कहते हैं कि वन मे ग्वालो के सग जाना, वहाँ से गायो के -साथ लौटना, ब्रज के सुन्दर दृश्यो को देख कर बाँसुरी बजाना आज भी मेरी

व्याख्या भाग ३१७ आंखो मे करकते है, अर्थात् उन घटनाओ की स्मृति से मुझे बहुत दुख होता है। यहाँ पर मुझे गज मोतियो की जो मालाये मिली हुई है, इन्हे मैं उन गुन्जमालाओ के ऊपर न्यौछावर कर सकता हूँ । जब भी मुझे ब्रज के कुंजों की याद आती है तो मेरे अंग धड़कने लगते है । वहाँ के गोबर का गारा भी मुझे इतना प्रिय है कि उसके सामने रत्नो से जडे हुए ये सोने के भव्य भवन भी नगण्य है। वह सच है कि द्वारिका के ये राजमहल मदिराचल (पर्वत) से ऊँचे है। फिर भी ब्रज की गोशालाओ की याद मेरे हृदय को कुदेरती रहती है । विशेष—यह कवित्त श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान ग्रन्थावली मे नही है । गंगा-महिमा सवैया इक ओर किरीट लसै दूसरी दिसि नागन के गन गाजत री । मुरली मधुरी धुनि आधिक ओठ पै आधिक नन्द से बाजत री ॥ रसखानि पितम्बर एक कँधा पर एक बाघम्बर राजत री । कोउ देखउ सगम लै बुड़की निकसे यहि मेख सो छाजत री ॥२५४॥ शब्दार्थ—किरीट = मुकुट । लसै = सुशोभित है । नागन के गन = सर्पों के समूह । अधिक = आधा । नाद = श्रृंगी । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से गंगा महिमा का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! उसके सिर पर एक ओर तो मुकुट सुशोभित है और दूसरी ओर सर्पों के समूह फुंकार रहे हैं । एक ओर आधे ओठ पर मधुरी मुरली बज रही है और दूसरी ओर आधे ओठ पर श्रृंगी बज रही है । रसखान कहते है कि उनके एक कन्धे पर पीला वस्त्र है और दूसरे पर बाघ की खाल सुशोभित है । ऐसा प्रतीत होता है कि कृष्ण गंगा और यमुना मे डुबकी लगाकर इस सुन्दर रूप को धारण करके निकले हो । विशेष—यह माना जाता है कि गंगा मे स्नान करने से शिवरुप की और यमुना मे स्नान करने से कृष्णरुप की, तथा सगम (गंगा-यमुना) मे स्नान करने से हरिहर (शिव-कृष्ण) रूप की प्राप्ति होती है ।

३१८ रसखान-ग्रन्थावली सवैया वैद की औपध खाइ कछू न करै बहु सजम री सुनि मोसें । तो जल-पान कियौ रसखानि सजीवन जानि लियौ रस तोसें । ए री सुधामई भागीरथी नित पथ्य अपथ्य वनै तोहि पोसैं । आक धतूरो चबात फिरै विख खात फिरै सिव तेरे भरोसें ॥२५५॥ विशेष-औपध = औषधि । सजम = संयम । भागीरथी = गंगा । पथ्य = 'परहेज । अपथ्य = बद परहेज । पोसैं = प्रसन्न करने पर । अर्थ-कवि रसखान गंगा की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि हे गंगे ! जिस व्यक्ति पर तुम्हारी कृपा हो जाती है, उसे न तो वैद्य की औषधि खाने की आवश्यकता है और न किसी प्रकार का संयम करने की ही जरूरत है । रसखान कहते हैं कि तेरे जल को पीने से सजीवन शक्ति और अपार आनन्द प्राप्त होता है । हे अमृत जल से युक्त गंगे ! तेरे प्रसन्न करने पर बदपरहेज भी परहेज के समान लाभदायक बन जाता है । इसीलिए तेरे भरोसे पर शिव आक और धतूरे को चबाते हैं तथा विष को खाते हैं । तुलना-'बाँधे जटाजूट बैठि परवत कूट माँहि, महाकाल कूटे कहौ कैसे के ठहरतौ । पीवै नित भगै रहै प्रेतन के सगै ऐसे, पूछतौ को नगें जो न गंगे सीस धारतौ ।' -पद्माकर शिव-महिमा सवैया यह देखि धतूरे के पात चवात औ गात सो धूलि लगावत हैं । चहुँ ओर जटा अटकैं लटकै फनि सो कफनी फहरावत हैं । रसखानि जे ई चितवैं चित दै तिनके दुखदुन्द भजावत हैं । गज खाल कमालकी माल विसाल सो गाल बजावत आवत हे ॥२५६॥ शब्दार्थ-पात = पत्ते । फनि = सर्प । कफनी = एक प्रकार का वस्त्र जिसे साधु पहनते हैं । भजावत है = नष्ट करते हैं : अर्थ-कवि रसखान शिव की स्तुति करते हुए कहते हैं कि यह देखो : शिव धतूरे के पत्ते चवाते हैं तथा शरीर मे धूलि लगाते हैं । उनकी जटाएँ

व्याख्या भाग ३१६ चारो ओर बिखर कर लटक रही है। उनके गले मे पड़ा हुआ सर्प साधु-वस्त्र के समान दिखाई दे रहा है। रसखान कहते है कि जो मन लगाकर शिव की इस मूर्ति को देखते है, शिव उनके दुखो को नष्ट करते है। वे गज की खाल ओढ़े, कपालो की माला पहने हुए गाल बजाते हुए आते है।

प्रेम-वाटिका दोहा प्रेम अयनि श्री राधिका, प्रेम-वरन नदनन्द । प्रेम-वाटिका के दोऊ, माली मालिन द्वंद ॥ १ ॥ शब्दार्थ—प्रेम-अयनि = प्रेम-धाम । प्रेम-वरन = प्रेम का साक्षात् रूप । द्वंद = युगल, जोडा । अर्थ—रसखान कवि राधा और कृष्ण के प्रेम का वर्णन करते हुए कहते है कि श्रीराधा प्रेम का धाम है और कृष्ण प्रेम का साक्षात् रूप है। अतः राधा और कृष्ण का जोडा प्रेम-वाटिका के मालिन और माली का जोड़ा है। विशेष—रूपक अलकार । दोहा प्रेम प्रेम सब कोउ कहत, प्रेम न जानत कोइ । जो जन जानै प्रेम तौ, परै जगत क्यों रोइ ॥ २ ॥ शब्दार्थ—सरल है । अर्थ—सब लोग प्रेम-प्रेम चिल्लाते हैं, अर्थात् प्रेमी होने का दावा करते हैं और प्रेम की महत्ता का बखान करते हैं, पर वास्तविकता तो यह है कि वे प्रेम के सच्चे स्वरूप को नही जानते । यदि व्यक्ति प्रेम के सच्चे स्वरूप से परिचित हो जाये ससार रो-रोकर न मरे, अर्थात् इसमे कोई क्लेश एव बाधा न रहे । दोहा प्रेम अगम अनुपम अमित, सागर सरिस वखान । जो आवत यहि ढिग बहुरि जात नाहिं रसखान ॥ ३ ॥ शब्दार्थ—अगम = अगम्य । अमित = अपार । सरिस = समान । ढिग = समीप । बहुरि = फिर । ३२०

व्याख्या भाग ३२१ अर्थ-प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि प्रेम को अगम्य, अनुपम, अपार और सागर के समान गम्भीर समझना चाहिए। जो व्यक्ति इस प्रेम-सागर के पास आ जाता है, वह फिर इसमे दूर नहीं जाता; अर्थात् जो प्रेमी बन जाता है, वह फिर प्रेम के बन्धन से नही छूट पाता। विशेष-उपमा अलंकार। दोहा प्रेम-वारुनी छानि कै, बरुन भरा जल घीस। प्रेमहि तें विष-पान करि, पूजे जात गिरीस ॥४॥ शब्दार्थ-वारुन = शराब। बरुन = वरुण। जलधीस = जल का देवता। अर्थ-प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि प्रेम की शराब छानने के कारण वरुण जल के देवता बन गये और प्रेम से ही विष को पी लेने के कारण शिव की पूजा होती है। दोहा प्रेम-रूप दर्पन अहो, रचै अजूबो खेल। या मै अपनो रूप कछु, लखि परिहै अनमेल ॥५॥ शब्दार्थ-दर्पन = दर्पण, शीशा। अजूबो = अजीब, अद्भुत। अर्थ-प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि प्रेम रूपी दर्पण मे अद्भुत खेल रचा हुआ है, क्योकि इसमे अपना स्वरूप कुछ-कुछ अनमेल-सा दिखाई देता है। दोहा कमल-तन्तु सो छीद अरु, कठिन खड़ग की धार। अति सूधो टेढ़ो बहुरि, प्रेम-पथ अनिवार ॥६॥ शब्दार्थ-कमल तंतु = कमल का रेशा। छीन = क्षीण, पतला। खड़ग = तलवार। बहुरि = फिर। अनिवार = अनिवार्य। अर्थ-प्रेम के स्वरूप का वर्णन करते हुए रसखान कवि कहते हैं कि प्रेम पंथ अनिवार्य रूप से विलक्षण है। यह कमल के रेशे के समान पतला और तलवार की धार के समान तीक्ष्ण होता है। यह अत्यन्त सीधा भी है और टेढां भी है। विशेष-उपमा अलंकार।

३२४ रसखान-ग्रन्थावली क्योकि प्रेम को अनुकूल बनाये बिना भगवत्प्रेम की ओर उन्मुख हुए बिना, दृढ़ निश्चयात्मिका बुद्धि उत्पन्न नही होती । दोहा सास्त्रन पढि पडित भए, कै मौलवी कुरान । जु पै प्रेम जान्यौ नही, कहा कियौ रसखान ॥१३॥ शब्दार्थ—सास्त्रन=शास्त्रो को । जु पै=यदि । अर्थ—प्रेम के बिना सारा ज्ञान व्यर्थ है, इस बात का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते है कि व्यक्ति चाहे शास्त्रो को पढकर पडित बन जाये, या कुरान को पढकर मौलवी बन जाये । लेकिन यदि उसने प्रेम-तत्त्व को नही जाना है तो उसका यह ज्ञान पूर्णतया व्यर्थ है । तुलना—'पोथी पढि पढि जग मुआ, पडित भया न कोय । ढाई अच्छर प्रेम का, पढै सो पंडित होय ॥—कबीर दोहा काम क्रोध मद मोह भय, लोभ द्रोह मात्सर्य । इन सबही तैं प्रेम है, परे कहत मुनिवर्य ॥१४॥ शब्दार्थ—काम=काम-भावना । मद=अहकार । द्रोह=शत्रुता । पत्यर्य ईर्ष्या । परे=दूर । पुनिवर्य=मुनि प्रवर । अर्थ—प्रेम सब प्रकार के भावो से श्रेष्ठ है और अशुद्ध भावो से दूर है, इसका प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते है कि काम-भावना, क्रोध, अहकार, ममता, भय, लोभ, शत्रुता और ईर्ष्या इन सभी भावो से प्रेम दूर होता है, अर्थात् प्रेम मे ये भाव नही होते । यह मुनिप्रवरो का मत है । दोहा बिन गुन जोवन रूप धन, बिन स्वारथ हित जानि । सुद्ध कामना ते रहित, प्रेम सकल रसखानि ॥१५॥ शब्दार्थ—गुन=गुण । जोवन=यौवन । बिन स्वारथ हित=स्वार्थ- लाभ से रहित । कामना=इच्छा । कामना ते रहित=निष्काम । रसखान= आनन्द का धाम । अर्थ—प्रेम के महत्त्व का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते है कि जो प्रेम बिना गुण के, यौवन के, रूप के, धन के, स्वार्थ-लाभ से रहित, शुद्ध और निष्काम होता है, वही सच्चा प्रेम है और ऐसा ही प्रेम सुख का धाम होता

व्याख्या भाग ३२५

है, अर्थात् सहज प्रेम ही सच्चा एव सुखकारक प्रेम होता है । दोहा अति सूक्षम कोमल अतिहि, अति पतरो अति दूर । प्रेम कठिन सब ते सदा, नित इकरस भरपूर ॥१६॥ शब्दार्थ—सूछम = सूक्ष्म । पतरो = पतला, क्षीण । अति दूर = अगम्य । इकरस = एक-सा रहने वाला । अर्थ—प्रेम के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते है कि सच्चा प्रेम अत्यन्त सूक्ष्म, कोमल, क्षीण और अगम्य होता है । यह सदैव एक- सा रहने वाला और परिपूर्ण होता है । ऐसा प्रेम सबसे कठिन होता है । दोहा जग मै सब जान्यौ परै, अरु सब कहै कहाइ । मै जगदीश 'रु प्रेम यह, दोऊ अकथ लखाइ ॥१७॥ शब्दार्थ—जान्यो परै = जाना जा सकता है । कहै कहाइ = कहा जा सकता है । अकथ = अकथ्य । अर्थ—प्रेम और ईश्वर की समानता का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते है कि इस ससार की सारी वस्तुएँ जानी जा सकती है, अर्थात् सारी वस्तुएँ बोधगम्य है और सारी वस्तुएँ कही जा सकती है, अर्थात् वर्णनीय हैं, किन्तु ईश्वर और प्रेम ये दोनो अकथ्य एव प्रदर्शनीय है । अर्थात् इन दोनो का न तो वर्णन ही किया जा सकता है और न ये दोनो देखे ही जा सकते हैं । कहने का भाव यह है कि प्रेम ईश्वर की भाँति सूक्ष्म एव दुर्बोध है । दोहा जेहि बिनु जाने कछुहि नहि, जान्यौ जात बिसेष । सोइ प्रेम, जेहि जानिकै, रहि न जात कछु सेष ॥१८॥ शब्दार्थ—सरल है । अर्थ—प्रेम की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते है कि जिस प्रेम को जाने बिना और किसी वस्तु का बोध नही होता और जिसे जानने पर विशेष ज्ञान हो जाता है वही प्रेम है जिसका बोध होने पर और कुछ जानने के लिए शेष नही रह जाता । कहने का भाव यह है कि प्रेम सब ज्ञानो का मूल आधार है ।

३२६ रसखान-ग्रन्थावली दोहा दम्पति-सुख अरु विषम-रस, पूजा निष्ठा ध्यान । इन ते परे वखांनियै, सुद्ध प्रेम रसखान ॥१६॥ शब्दार्थ—दम्पति-सुख = गृहस्थ जीवन का आनन्द । विषय-रस = सांसा- रिक पदार्थों से प्राप्त आनन्द । निष्ठा = धार्मिक विश्वास । ध्यान = ध्यान धारणा आदि । परे = दूर, रहित । अर्थ—शुद्ध प्रेम के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते हैं कि गृहस्थ जीवन के आनन्द से, सांसारिक पदार्थों से प्राप्त आनन्द से, पूजा से धार्मिक विश्वास से, ध्यान धारणा आदि से रहित शुद्ध प्रेम होता है जो आनन्द का सागर है । दोहा मित्र कलत्र सुवन्धु सुत, इनमे सहज सनेह । सुद्ध प्रेम इनमे नही, अकथ कथा सविसेह ॥२०॥ शब्दार्थ—कलत्र = स्त्री। सुवन्धु = हितैषी भाई। सुत = पुत्र । सहज = स्वाभाविक । सविसेह = विशेष रूप से । अर्थ—शुद्ध प्रेम के स्वरूप का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि यद्यपि स्त्री मे हितैषी भाई मे और पुत्र मे स्वाभाविक रूप से प्रेम होता है, परन्तु इस प्रेम को शुद्ध प्रेम नही कहा जा सकता, क्योकि शुद्ध प्रेम तो विशेष रूप से अवर्णनीय कथावाला होता है; अर्थात् उसका वर्णन नही हो सकता । दोहा इक अंगी बिनु कारनहिं, इक रस सदा समान । गनै प्रियहि सर्वस्व जो, सोई प्रेम प्रमान ॥२१॥ शब्दार्थ—इक अंगी = एकांगी । इक रस = एक ही प्रकार का आनन्द । सोई प्रेम प्रमान = वही शुद्ध प्रेम है । अर्थ—शुद्ध प्रेम के स्वरूप का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि जो प्रेम एकांगी हो, अर्थात् प्रत्युत्तर की भावना से परे हो, बिना स्वार्थ आदि कारणो के उत्पन्न हुआ हो और सदैव एक ही प्रकार के आनन्द मे समान रहता हो, अर्थात् जिसमे आनन्द की मात्रा घटती न हो; जिसके होने पर प्रिय को ही सर्वस्व माना जाता हो, वही शुद्ध प्रेम कहलाता है ।

व्याख्या भाग ३२७ दोहा डरै सदा चाहे न कछु, सहै सबै जो होय । रहै एक रस चाहि कै, प्रेम बखानो सोय ॥२२॥ शब्दार्थ—चाहि कै=इच्छा करके । अर्थ—शुद्ध प्रेम के स्वरूप का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि जो प्रेमी सदैव इस भावना को लेकर डरता रहे कि कही उसके प्रेम मे चूक न हो जाये, जो किसी भी प्रकार की स्वार्थ-भावना से रहित हो, जो सब प्रकार की विपत्तियो को सहने के लिए तैयार हो, जो सदैव इच्छा करके एक ही रस मे डूबा हुआ हो, ऐसे ही व्यक्ति को सच्चा प्रेमी कहा जाता है और उसी का प्रेम शुद्ध प्रेम कहलाता है । दोहा प्रेम प्रेम सब कोउ कहै, कठिन प्रेम की फाँस । प्रान तरफि निकरै नही, केवल चलत उसाँस ॥२३॥ शब्दार्थ—फाँस=चुभने वाला काँटा । तरफि=तडप कर । अर्थ—प्रेम वेदना का वर्णन करते हुए रसखान कहते है- कि सभी लोग प्रेम-प्रेम चिल्लाते है; अर्थात् प्रेमी होने का दावा करते है, पर वे यह नहीं जानते कि प्रेम की फाँस बडी दुखदाई होती है । इसमे प्राण तडपते ही रहते है, पर निकलते नही इसके आघात से मनुष्य मृतप्राय हो जाता है और उसके केवल उच्छ्वास चलते रहते है । दोहा प्रेम हरी को रूप है, त्यौ हरि प्रेम स्वरूप । एक होइ द्वै यो लसै, ज्यौ सूरज अरु धूप ॥२४॥ शब्दार्थ—द्वै=दो होकर । लसै=सुशोभित होते है । अर्थ—प्रेम और परमात्मा के एक स्वरूप का वर्णन करते हुए रसखान कहते है कि जिस प्रकार प्रेम परमात्मा का रूप है, उसी प्रकार परमात्मा भी प्रेम का स्वरूप है । एक होकर भी दोनो दो रूपो मे इस प्रकार सुशोभित है जैसे सूरज और उसकी धूप । विशेष—उदाहरण अलकार । दोहा ग्यान ध्यान विद्या मती, मत-विस्वास बिबेक । बिना प्रेम सब धूरि हैं, अगजग एक अनेक ॥२५॥

३२८ रसखान-ग्रन्थावली शब्दार्थ—मती=मति, बुद्धि। विवेक=ज्ञान। अगजग एक अनेक= इस चराचर सृष्टि मे प्रेम एक होकर भी अनेक है। अर्थ—प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि ज्ञान, ध्यान, विद्या, विविध मतो का विश्वास और विवेक सब बिना प्रेम के धूलि के समान निरर्थक है, क्योकि प्रेम ही वह तत्त्व है जो ब्रह्म की भाँति इस संसार मे एक होते हुए ही अनेक रूपो मे दिखाई देता है। विशेष—रूपक अलकार। दोहा प्रेम फाँस मैं फँसि मरै, सोई जिए सदाहि। प्रेम परम जाने विना, मरि कोइ जीवत नाहिं ॥२६॥ शब्दार्थ—फाँश=फन्दा। परम=रहस्य। अर्थ—प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि जो व्यक्ति प्रेम के वन्धन मे बँध कर मर जाता है, कह सदैव जीवित रहता है; अर्थात् प्रेम के वन्धन मे बँधकर व्यक्ति अमर हो जाता है। कोई भी व्यक्ति जो प्रेम के रहस्य को नही जानता, वह मर कर जीवित नही रहता। विशेष—विरोधाभास अलकार। दोहा जग मैं सब तैं अधिक अति, ममता तनहिं लखाय। पै या तरतहूँ तैं अधिक, प्यारो प्रेम कहाय ॥२७॥ शब्दार्थ—सरल है। अर्थ—प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि हम ससार मे सबसे अधिकम मत्व शरीर के प्रति देखा जाता है, परन्तु प्रेम इस शरीर से भी अधिक प्यारा होता है। दोहा जेहि पाएँ बैकुंठ अरु, हरिहूँ की नहिं चाहि। सोह अलौकिक सुद्ध सुभ, सरस सुप्रेम कहाहि ॥२८॥ शब्दार्थ—सरल है। अर्थ—प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि जिस प्रेम को प्राप्त करके वैकुंठ की और भगवान की भी इच्छा नही रहती, उसे ही अलौकिक, शुद्ध, शुभ और सरस प्रेम कहा जाता है।

व्याख्या भाग ३२६ दोहा कोउ याहि फाँसी कहत, कोउ कहत तरवार। नेजा भाला तीर कोउ, कहत अनोखी ढार ॥२६॥ शब्दार्थ-नेजा = बरछी । अर्थ-प्रेम के विविध रूप हैं, इसी बात का वर्णन करते हुए रसखान कहते है कि कोई व्यक्ति तो इस प्रेम को फाँसी बताता है, कोई तलवार, कोई बरछी, भाला और तीर; तथा कोई इसे अनोखी ढाल बताता है। दोहा पै मिठास या मार के, रोम-रोम भरपूर । मरत जियै झुकतौ थिरै, बनै सु चकनाचूर ॥३०॥ शब्दार्थ-झुकतौ = गिरना । थिरै = स्थिर होना, सभलना । अर्थ-प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते है कि प्रेम की चोट गहरी होते हुए भी मधुर होती है। इसकी चोट से मनुष्य का रोम-रोम माधुर्यपूर्ण आनन्द से भरपूर हो जाता है, प्रेम मे मरने वाला व्यक्ति ही जीवित रहता है प्रेम मे गिरता हुआ व्यक्ति ही सम्भलता है। जो व्यक्ति अपना अहंकार पूर्णतया नष्ट करके प्रेम की ओर उन्मुख होता है, उसी का जीवन सुधर जाता है। विशेष-विरोधाभास अलंकार । दोहा पै एतोहूँ रम सुन्यौ, प्रेम अजूबो खेल । जाँबाजी बाजी जहाँ, दिल का दिल से मेल ॥३१॥ शब्दार्थ-अजूबो = अजीब, अद्भुत । जाँबाजी = प्राणो की बाजा । अर्थ-प्रेम की विलक्षणता का वर्णन करते हुए रसखान कहते है कि हमने केवल इतना सुना है कि प्रेम अद्भुत खेल है यह वही खेल है जिसमे प्राणों की बाजी लगाकर दिल से मेल किया जाता है। दोहा सिर काटौ छेदौ हियो, टूक टूक करि देहु । पै याके बदले जिहंसि, वाह वाह ही लेहु ॥३२॥ शब्दार्थ-सरल है।

३३० रसखान-ग्रन्थावली

अर्थ—प्रेम की कठिनता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि जब व्यक्ति अपने सिर को काट लेता है और हृदय को छेद कर टूक-टूक कर लेता है, तब उसके बदले मे उसे प्रशसा मिलती है, अर्थात् वही व्यक्ति प्रेमी होकर प्रशसा का पात्र बनता है । दोहा अकथ कहानी प्रेम की, जानत लैली खूब । दो तनहूँ जहँ एक ये, मन मिलाइ महबूब ॥३३॥ शब्दार्थ—अकथ=अकथ्य । लैली=लैला, मजनूं की प्रेमिका । महबूब= प्रेमी । अर्थ—प्रेम की कहानी अकथनीय है जिसे मजनू की प्रेमिका लैला अच्छी तरह जानती है । प्रेम वह वरदान है जो दो प्रेमियो के तन को तथा मन को मिलाकर एक कर देता है । दोहा दो मन इक होते सुन्यौ, पै वह प्रेम न आहि होइ जबै द्वै तनहुँ इक, सोई प्रेम कहाहि ॥३४॥ शब्दार्थ—आहि=है । अर्थ—प्रेम के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते है कि यद्यपि मैंने प्रेम मे दो मनो को एक होते हुए सुना है, लेकिन यह वास्तविक प्रेम नही है । जब दो शरीर एक हो जाते हैं, तो उसे ही प्रेम कहते हैं । 'प्रेमानन्द प्रकारेण द्वैत विस्मरणं गतम् ।' तुलना—१. 'आसिक-मासुक ह्वै गया, इश्क कहावै सोय । दादू उस मासूक का, अल्ला आसिक होय ॥'—दादूदयाल दोहा याही तें सब मुक्ति ते, लही बडाई प्रेम । प्रेम भए नसि जाहि सब, बँधे जगत के नेम ॥३५॥ शब्दार्थ—याही ते=इसी कारण से । लही=प्राप्त की । नसि जाहि= नष्ट हो जाते हैं । नेम=नियम । अर्थ—प्रेम मे दो शरीरो को एक करने की शक्ति होती है, इसी कारण से प्रेम ने मुक्ति से भी अधिक प्रशसा प्राप्त की है, अर्थात् प्रेम का स्थान मुक्ति

व्याख्या भाग ३३१ से भी ऊँचा है। प्रेम के होने पर संसार के सारे बँधे हुए नियम नष्ट हो जाते हैं, अर्थात् प्रेमी संसार के किसी भी नियम को नही मानता। दोहा हरि के सब आधीन पै, हरी प्रेम-अधीन। याही ते हरि आपुही, याहि बडप्पन दीन ॥३६॥ शब्दार्थ—सरल है। अर्थ—प्रेम भगवान से भी बडा है, इसी बात का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते है कि ससार के सब प्राणी भगवान के वश मे हैं, पर भगवान प्रेम के वश मे होते है। इसीलिए स्वय भगवान् से अपने-से अधिक प्रेम को महत्ता प्रदान की है। तुलना—१. 'हरि ब्रज जन आधीन है, ब्रजजन॒ हरि आधीन।'—नागरीदास २. 'स्वामी ते सेवक बडो, जो निज धर्म सुजान । राम बाँधि उतरे उदधि, लाँघि गए हनुमान ॥'—तुलसी दोहा वेद मूल सब धर्म यह, कहैं सबै स्रुतिसार। परम धर्म है ताहु ते, प्रेम एक अनिवार ॥३७॥ शब्दार्थ—स्रुतिसार=वेदो का तत्व । अनिवार=अनिवार्य । अर्थ—प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते है कि वेद सब धर्मो का मूल है, परन्तु प्रेम को श्रुतियो का तत्व कहा जाता हैं। इसलिए प्रेम परम धर्म और अनिवार्य तत्त्व है। जदपि जसोदानन्दन अरु ग्वाल-वाल सब धन्य । पै या जग मैं प्रेम कौ गोपी भई अनन्य ॥३८॥ शब्दार्थ—जसोदानन्दन = कृष्ण । अनन्य=अद्वितीय । अर्थ—प्रेम की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते है कि यद्यपि कृष्ण का प्रेम पाने से कृष्ण, ग्वाल-बाल आदि सब धन्य है, किन्तु इस ससार मे अत्यधिक प्रेमिका होने के कारण गोपियाँ अद्वितीय बन गई है; अर्थात् उनके समान कोई नही है। तुलना—'कविरा कविरा क्या कहै, जा जमुना के तीर । इक इक गोपी प्रेम पै, बहिगे कोटि कबीर ॥'—कबीर

३३२ रसखान-ग्रन्थावली दोहा वा रस की कछु माधुरी, ऊधो लही सराहि । पावै बहुरि मिठास अरु, अब दूजो को आहि ॥३६॥ शब्दार्थ—वा रस की=प्रेमानन्द की । बहुरि=फिर । अर्थ—प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते है कि प्रेमानन्द का कुछ माधुर्य उद्धव ने सराह कर ग्रहण किया था। जो माधुर्य उद्धव को प्राप्त हो गया है, अब उस माधुर्य को फिर से कौन प्राप्त कर सकता है ? दोहा स्रवन कीरतन दरसनंहि, जो उपजत सोइ प्रेम । सुद्धासुद्ध विभेद तैं, द्वैविध ताके नेम ॥४०॥ शब्दार्थ—स्रवन=श्रवण, सुनना । सुद्धासुद्ध=शुद्ध और अशुद्ध । द्वैविध =दो प्रकार के । नेम=नियम । अर्थ—प्रेम के भेदो का निरुपण करते हुए रसखान कहते हैं कि जो प्रेम श्रवण, कीर्तन और दर्शन से उत्पन्न होता है, वही शुद्ध और अशुद्ध, निष्काम और सकाम, ये दो प्रकार के प्रेम होते हैं। दोहा स्वारथमूल अशुद्ध त्यौ, सुद्ध स्वभावऽनुकूल । नारदादि प्रस्तार करि, कियौ जाहि को तूल ॥४१॥ शब्दार्थ—स्वारथमूल=स्वार्थ-भावना से युक्त । स्वभावऽनुकूल=सहज भाव से । प्रस्तार करि=विस्तार से । तूल=विस्तार । अर्थ—प्रेम के दो भेद होते हैं—शुद्ध और अशुद्ध । शुद्ध और अशुद्ध प्रेम के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते हैं कि जो प्रेम स्वार्थ-भावना से युक्त होता है, उसे अशुद्ध प्रेम कहते है और जो सहज भाव से होता है, उसे शुद्ध प्रेम कहते हैं। नारद आदि महर्षियों ने इन दोनों प्रकार के प्रेमो का वर्णन विस्तार से किया है। दोहा रसमय स्वाभाविक बिना, स्वारथ अचल महान । सदा एकरस सुद्ध सोइ, प्रेम अहै रसखान ॥४२॥ शब्दार्थ—रसमय=आनन्द से पूर्ण । स्वाभाविक=सहज । एकरस= निरन्तर समान रहने वाला ।

व्याख्या भाग ३३३ अर्थ—शुद्ध प्रेम के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते हैं कि- जो प्रेम आनन्द से पूर्ण, सहज, निष्काम, अचल, महान् और निरन्तर समान- रहने वाला होता है, जो कभी घटता नहीं है, वह शुद्ध प्रेम कहलाता है। दोहा जाते उपजत प्रेम सोह, बीज कहावत प्रेम। जामैं उपजत प्रेम सोइ, क्षेत्र कहावत प्रेम ॥४३॥ शब्दार्थ—सरल है। अर्थ—प्रेम के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते हैं कि जिस कारण से प्रेम उत्पन्न होता है, उसे प्रेम का बीज कहते हैं और जो प्रेम का- आश्रय होता है, उसे प्रेम का क्षेत्र कहते हैं। दोहा जाते पनपत बढ़त अरु, फूलत फलत महान। सो सब प्रेमहि प्रेम यह, कहत रसिक रसखान ॥४४॥ शब्दार्थ—सरल है। अर्थ—प्रेम के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते हैं कि- जिससे प्रेम उत्पन्न होता है, बढ़ता है, फूलता तथा बढ़ता है और महान् बनता है, यह सब प्रेम ही होता है। दोहा वही बीज अंकुर वही, सेक वही आधार। डाल पात फल फूल सब, वही प्रेम सुखसार ॥४५॥ शब्दार्थ—सेक = सिंचन । अर्थ—प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि प्रेम ही- बीज है, वही अंकुर है, वही सिंचन है, वही आधार है, वही डाल, पात, फल, फूल और सुख का सार है। दोहा जो जाते जामैं बहुरि, जा हित कहियत बेष। सो सब प्रेमहि प्रेम है, जग रसखानि असेष ॥४६॥ शब्दार्थ—बहुरि=फिर। बेष=श्रेष्ठ। असेष=पूर्णरूप से। अर्थ—प्रेम की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते हैं कि जो, जिससे और फिर जिसमे जगत् का सौन्दर्य, श्रेयता, महत्ता, उत्कृष्टता आदि- गुण विद्यमान हैं, वे सब इस चराचर सृष्टि में प्रेम-रूप से भासित हैं।