रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग ३२१ अर्थ-प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि प्रेम को अगम्य, अनुपम, अपार और सागर के समान गम्भीर समझना चाहिए। जो व्यक्ति इस प्रेम-सागर के पास आ जाता है, वह फिर इसमे दूर नहीं जाता; अर्थात् जो प्रेमी बन जाता है, वह फिर प्रेम के बन्धन से नही छूट पाता। विशेष-उपमा अलंकार। दोहा प्रेम-वारुनी छानि कै, बरुन भरा जल घीस। प्रेमहि तें विष-पान करि, पूजे जात गिरीस ॥४॥ शब्दार्थ-वारुन = शराब। बरुन = वरुण। जलधीस = जल का देवता। अर्थ-प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि प्रेम की शराब छानने के कारण वरुण जल के देवता बन गये और प्रेम से ही विष को पी लेने के कारण शिव की पूजा होती है। दोहा प्रेम-रूप दर्पन अहो, रचै अजूबो खेल। या मै अपनो रूप कछु, लखि परिहै अनमेल ॥५॥ शब्दार्थ-दर्पन = दर्पण, शीशा। अजूबो = अजीब, अद्भुत। अर्थ-प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि प्रेम रूपी दर्पण मे अद्भुत खेल रचा हुआ है, क्योकि इसमे अपना स्वरूप कुछ-कुछ अनमेल-सा दिखाई देता है। दोहा कमल-तन्तु सो छीद अरु, कठिन खड़ग की धार। अति सूधो टेढ़ो बहुरि, प्रेम-पथ अनिवार ॥६॥ शब्दार्थ-कमल तंतु = कमल का रेशा। छीन = क्षीण, पतला। खड़ग = तलवार। बहुरि = फिर। अनिवार = अनिवार्य। अर्थ-प्रेम के स्वरूप का वर्णन करते हुए रसखान कवि कहते हैं कि प्रेम पंथ अनिवार्य रूप से विलक्षण है। यह कमल के रेशे के समान पतला और तलवार की धार के समान तीक्ष्ण होता है। यह अत्यन्त सीधा भी है और टेढां भी है। विशेष-उपमा अलंकार।