भारतकोश
रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 337, कुल 368 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 337

प्रेम-वाटिका दोहा प्रेम अयनि श्री राधिका, प्रेम-वरन नदनन्द । प्रेम-वाटिका के दोऊ, माली मालिन द्वंद ॥ १ ॥ शब्दार्थ—प्रेम-अयनि = प्रेम-धाम । प्रेम-वरन = प्रेम का साक्षात् रूप । द्वंद = युगल, जोडा । अर्थ—रसखान कवि राधा और कृष्ण के प्रेम का वर्णन करते हुए कहते है कि श्रीराधा प्रेम का धाम है और कृष्ण प्रेम का साक्षात् रूप है। अतः राधा और कृष्ण का जोडा प्रेम-वाटिका के मालिन और माली का जोड़ा है। विशेष—रूपक अलकार । दोहा प्रेम प्रेम सब कोउ कहत, प्रेम न जानत कोइ । जो जन जानै प्रेम तौ, परै जगत क्यों रोइ ॥ २ ॥ शब्दार्थ—सरल है । अर्थ—सब लोग प्रेम-प्रेम चिल्लाते हैं, अर्थात् प्रेमी होने का दावा करते हैं और प्रेम की महत्ता का बखान करते हैं, पर वास्तविकता तो यह है कि वे प्रेम के सच्चे स्वरूप को नही जानते । यदि व्यक्ति प्रेम के सच्चे स्वरूप से परिचित हो जाये ससार रो-रोकर न मरे, अर्थात् इसमे कोई क्लेश एव बाधा न रहे । दोहा प्रेम अगम अनुपम अमित, सागर सरिस वखान । जो आवत यहि ढिग बहुरि जात नाहिं रसखान ॥ ३ ॥ शब्दार्थ—अगम = अगम्य । अमित = अपार । सरिस = समान । ढिग = समीप । बहुरि = फिर । ३२०