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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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३२४ रसखान-ग्रन्थावली क्योकि प्रेम को अनुकूल बनाये बिना भगवत्प्रेम की ओर उन्मुख हुए बिना, दृढ़ निश्चयात्मिका बुद्धि उत्पन्न नही होती । दोहा सास्त्रन पढि पडित भए, कै मौलवी कुरान । जु पै प्रेम जान्यौ नही, कहा कियौ रसखान ॥१३॥ शब्दार्थ—सास्त्रन=शास्त्रो को । जु पै=यदि । अर्थ—प्रेम के बिना सारा ज्ञान व्यर्थ है, इस बात का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते है कि व्यक्ति चाहे शास्त्रो को पढकर पडित बन जाये, या कुरान को पढकर मौलवी बन जाये । लेकिन यदि उसने प्रेम-तत्त्व को नही जाना है तो उसका यह ज्ञान पूर्णतया व्यर्थ है । तुलना—'पोथी पढि पढि जग मुआ, पडित भया न कोय । ढाई अच्छर प्रेम का, पढै सो पंडित होय ॥—कबीर दोहा काम क्रोध मद मोह भय, लोभ द्रोह मात्सर्य । इन सबही तैं प्रेम है, परे कहत मुनिवर्य ॥१४॥ शब्दार्थ—काम=काम-भावना । मद=अहकार । द्रोह=शत्रुता । पत्यर्य ईर्ष्या । परे=दूर । पुनिवर्य=मुनि प्रवर । अर्थ—प्रेम सब प्रकार के भावो से श्रेष्ठ है और अशुद्ध भावो से दूर है, इसका प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते है कि काम-भावना, क्रोध, अहकार, ममता, भय, लोभ, शत्रुता और ईर्ष्या इन सभी भावो से प्रेम दूर होता है, अर्थात् प्रेम मे ये भाव नही होते । यह मुनिप्रवरो का मत है । दोहा बिन गुन जोवन रूप धन, बिन स्वारथ हित जानि । सुद्ध कामना ते रहित, प्रेम सकल रसखानि ॥१५॥ शब्दार्थ—गुन=गुण । जोवन=यौवन । बिन स्वारथ हित=स्वार्थ- लाभ से रहित । कामना=इच्छा । कामना ते रहित=निष्काम । रसखान= आनन्द का धाम । अर्थ—प्रेम के महत्त्व का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते है कि जो प्रेम बिना गुण के, यौवन के, रूप के, धन के, स्वार्थ-लाभ से रहित, शुद्ध और निष्काम होता है, वही सच्चा प्रेम है और ऐसा ही प्रेम सुख का धाम होता