रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग ३२५
है, अर्थात् सहज प्रेम ही सच्चा एव सुखकारक प्रेम होता है । दोहा अति सूक्षम कोमल अतिहि, अति पतरो अति दूर । प्रेम कठिन सब ते सदा, नित इकरस भरपूर ॥१६॥ शब्दार्थ—सूछम = सूक्ष्म । पतरो = पतला, क्षीण । अति दूर = अगम्य । इकरस = एक-सा रहने वाला । अर्थ—प्रेम के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते है कि सच्चा प्रेम अत्यन्त सूक्ष्म, कोमल, क्षीण और अगम्य होता है । यह सदैव एक- सा रहने वाला और परिपूर्ण होता है । ऐसा प्रेम सबसे कठिन होता है । दोहा जग मै सब जान्यौ परै, अरु सब कहै कहाइ । मै जगदीश 'रु प्रेम यह, दोऊ अकथ लखाइ ॥१७॥ शब्दार्थ—जान्यो परै = जाना जा सकता है । कहै कहाइ = कहा जा सकता है । अकथ = अकथ्य । अर्थ—प्रेम और ईश्वर की समानता का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते है कि इस ससार की सारी वस्तुएँ जानी जा सकती है, अर्थात् सारी वस्तुएँ बोधगम्य है और सारी वस्तुएँ कही जा सकती है, अर्थात् वर्णनीय हैं, किन्तु ईश्वर और प्रेम ये दोनो अकथ्य एव प्रदर्शनीय है । अर्थात् इन दोनो का न तो वर्णन ही किया जा सकता है और न ये दोनो देखे ही जा सकते हैं । कहने का भाव यह है कि प्रेम ईश्वर की भाँति सूक्ष्म एव दुर्बोध है । दोहा जेहि बिनु जाने कछुहि नहि, जान्यौ जात बिसेष । सोइ प्रेम, जेहि जानिकै, रहि न जात कछु सेष ॥१८॥ शब्दार्थ—सरल है । अर्थ—प्रेम की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते है कि जिस प्रेम को जाने बिना और किसी वस्तु का बोध नही होता और जिसे जानने पर विशेष ज्ञान हो जाता है वही प्रेम है जिसका बोध होने पर और कुछ जानने के लिए शेष नही रह जाता । कहने का भाव यह है कि प्रेम सब ज्ञानो का मूल आधार है ।