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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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३२६ रसखान-ग्रन्थावली दोहा दम्पति-सुख अरु विषम-रस, पूजा निष्ठा ध्यान । इन ते परे वखांनियै, सुद्ध प्रेम रसखान ॥१६॥ शब्दार्थ—दम्पति-सुख = गृहस्थ जीवन का आनन्द । विषय-रस = सांसा- रिक पदार्थों से प्राप्त आनन्द । निष्ठा = धार्मिक विश्वास । ध्यान = ध्यान धारणा आदि । परे = दूर, रहित । अर्थ—शुद्ध प्रेम के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते हैं कि गृहस्थ जीवन के आनन्द से, सांसारिक पदार्थों से प्राप्त आनन्द से, पूजा से धार्मिक विश्वास से, ध्यान धारणा आदि से रहित शुद्ध प्रेम होता है जो आनन्द का सागर है । दोहा मित्र कलत्र सुवन्धु सुत, इनमे सहज सनेह । सुद्ध प्रेम इनमे नही, अकथ कथा सविसेह ॥२०॥ शब्दार्थ—कलत्र = स्त्री। सुवन्धु = हितैषी भाई। सुत = पुत्र । सहज = स्वाभाविक । सविसेह = विशेष रूप से । अर्थ—शुद्ध प्रेम के स्वरूप का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि यद्यपि स्त्री मे हितैषी भाई मे और पुत्र मे स्वाभाविक रूप से प्रेम होता है, परन्तु इस प्रेम को शुद्ध प्रेम नही कहा जा सकता, क्योकि शुद्ध प्रेम तो विशेष रूप से अवर्णनीय कथावाला होता है; अर्थात् उसका वर्णन नही हो सकता । दोहा इक अंगी बिनु कारनहिं, इक रस सदा समान । गनै प्रियहि सर्वस्व जो, सोई प्रेम प्रमान ॥२१॥ शब्दार्थ—इक अंगी = एकांगी । इक रस = एक ही प्रकार का आनन्द । सोई प्रेम प्रमान = वही शुद्ध प्रेम है । अर्थ—शुद्ध प्रेम के स्वरूप का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि जो प्रेम एकांगी हो, अर्थात् प्रत्युत्तर की भावना से परे हो, बिना स्वार्थ आदि कारणो के उत्पन्न हुआ हो और सदैव एक ही प्रकार के आनन्द मे समान रहता हो, अर्थात् जिसमे आनन्द की मात्रा घटती न हो; जिसके होने पर प्रिय को ही सर्वस्व माना जाता हो, वही शुद्ध प्रेम कहलाता है ।

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