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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग ३२७ दोहा डरै सदा चाहे न कछु, सहै सबै जो होय । रहै एक रस चाहि कै, प्रेम बखानो सोय ॥२२॥ शब्दार्थ—चाहि कै=इच्छा करके । अर्थ—शुद्ध प्रेम के स्वरूप का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि जो प्रेमी सदैव इस भावना को लेकर डरता रहे कि कही उसके प्रेम मे चूक न हो जाये, जो किसी भी प्रकार की स्वार्थ-भावना से रहित हो, जो सब प्रकार की विपत्तियो को सहने के लिए तैयार हो, जो सदैव इच्छा करके एक ही रस मे डूबा हुआ हो, ऐसे ही व्यक्ति को सच्चा प्रेमी कहा जाता है और उसी का प्रेम शुद्ध प्रेम कहलाता है । दोहा प्रेम प्रेम सब कोउ कहै, कठिन प्रेम की फाँस । प्रान तरफि निकरै नही, केवल चलत उसाँस ॥२३॥ शब्दार्थ—फाँस=चुभने वाला काँटा । तरफि=तडप कर । अर्थ—प्रेम वेदना का वर्णन करते हुए रसखान कहते है- कि सभी लोग प्रेम-प्रेम चिल्लाते है; अर्थात् प्रेमी होने का दावा करते है, पर वे यह नहीं जानते कि प्रेम की फाँस बडी दुखदाई होती है । इसमे प्राण तडपते ही रहते है, पर निकलते नही इसके आघात से मनुष्य मृतप्राय हो जाता है और उसके केवल उच्छ्वास चलते रहते है । दोहा प्रेम हरी को रूप है, त्यौ हरि प्रेम स्वरूप । एक होइ द्वै यो लसै, ज्यौ सूरज अरु धूप ॥२४॥ शब्दार्थ—द्वै=दो होकर । लसै=सुशोभित होते है । अर्थ—प्रेम और परमात्मा के एक स्वरूप का वर्णन करते हुए रसखान कहते है कि जिस प्रकार प्रेम परमात्मा का रूप है, उसी प्रकार परमात्मा भी प्रेम का स्वरूप है । एक होकर भी दोनो दो रूपो मे इस प्रकार सुशोभित है जैसे सूरज और उसकी धूप । विशेष—उदाहरण अलकार । दोहा ग्यान ध्यान विद्या मती, मत-विस्वास बिबेक । बिना प्रेम सब धूरि हैं, अगजग एक अनेक ॥२५॥