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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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३२८ रसखान-ग्रन्थावली शब्दार्थ—मती=मति, बुद्धि। विवेक=ज्ञान। अगजग एक अनेक= इस चराचर सृष्टि मे प्रेम एक होकर भी अनेक है। अर्थ—प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि ज्ञान, ध्यान, विद्या, विविध मतो का विश्वास और विवेक सब बिना प्रेम के धूलि के समान निरर्थक है, क्योकि प्रेम ही वह तत्त्व है जो ब्रह्म की भाँति इस संसार मे एक होते हुए ही अनेक रूपो मे दिखाई देता है। विशेष—रूपक अलकार। दोहा प्रेम फाँस मैं फँसि मरै, सोई जिए सदाहि। प्रेम परम जाने विना, मरि कोइ जीवत नाहिं ॥२६॥ शब्दार्थ—फाँश=फन्दा। परम=रहस्य। अर्थ—प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि जो व्यक्ति प्रेम के वन्धन मे बँध कर मर जाता है, कह सदैव जीवित रहता है; अर्थात् प्रेम के वन्धन मे बँधकर व्यक्ति अमर हो जाता है। कोई भी व्यक्ति जो प्रेम के रहस्य को नही जानता, वह मर कर जीवित नही रहता। विशेष—विरोधाभास अलकार। दोहा जग मैं सब तैं अधिक अति, ममता तनहिं लखाय। पै या तरतहूँ तैं अधिक, प्यारो प्रेम कहाय ॥२७॥ शब्दार्थ—सरल है। अर्थ—प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि हम ससार मे सबसे अधिकम मत्व शरीर के प्रति देखा जाता है, परन्तु प्रेम इस शरीर से भी अधिक प्यारा होता है। दोहा जेहि पाएँ बैकुंठ अरु, हरिहूँ की नहिं चाहि। सोह अलौकिक सुद्ध सुभ, सरस सुप्रेम कहाहि ॥२८॥ शब्दार्थ—सरल है। अर्थ—प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि जिस प्रेम को प्राप्त करके वैकुंठ की और भगवान की भी इच्छा नही रहती, उसे ही अलौकिक, शुद्ध, शुभ और सरस प्रेम कहा जाता है।

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