रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग ३२६ दोहा कोउ याहि फाँसी कहत, कोउ कहत तरवार। नेजा भाला तीर कोउ, कहत अनोखी ढार ॥२६॥ शब्दार्थ-नेजा = बरछी । अर्थ-प्रेम के विविध रूप हैं, इसी बात का वर्णन करते हुए रसखान कहते है कि कोई व्यक्ति तो इस प्रेम को फाँसी बताता है, कोई तलवार, कोई बरछी, भाला और तीर; तथा कोई इसे अनोखी ढाल बताता है। दोहा पै मिठास या मार के, रोम-रोम भरपूर । मरत जियै झुकतौ थिरै, बनै सु चकनाचूर ॥३०॥ शब्दार्थ-झुकतौ = गिरना । थिरै = स्थिर होना, सभलना । अर्थ-प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते है कि प्रेम की चोट गहरी होते हुए भी मधुर होती है। इसकी चोट से मनुष्य का रोम-रोम माधुर्यपूर्ण आनन्द से भरपूर हो जाता है, प्रेम मे मरने वाला व्यक्ति ही जीवित रहता है प्रेम मे गिरता हुआ व्यक्ति ही सम्भलता है। जो व्यक्ति अपना अहंकार पूर्णतया नष्ट करके प्रेम की ओर उन्मुख होता है, उसी का जीवन सुधर जाता है। विशेष-विरोधाभास अलंकार । दोहा पै एतोहूँ रम सुन्यौ, प्रेम अजूबो खेल । जाँबाजी बाजी जहाँ, दिल का दिल से मेल ॥३१॥ शब्दार्थ-अजूबो = अजीब, अद्भुत । जाँबाजी = प्राणो की बाजा । अर्थ-प्रेम की विलक्षणता का वर्णन करते हुए रसखान कहते है कि हमने केवल इतना सुना है कि प्रेम अद्भुत खेल है यह वही खेल है जिसमे प्राणों की बाजी लगाकर दिल से मेल किया जाता है। दोहा सिर काटौ छेदौ हियो, टूक टूक करि देहु । पै याके बदले जिहंसि, वाह वाह ही लेहु ॥३२॥ शब्दार्थ-सरल है।