रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३० रसखान-ग्रन्थावली
अर्थ—प्रेम की कठिनता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि जब व्यक्ति अपने सिर को काट लेता है और हृदय को छेद कर टूक-टूक कर लेता है, तब उसके बदले मे उसे प्रशसा मिलती है, अर्थात् वही व्यक्ति प्रेमी होकर प्रशसा का पात्र बनता है । दोहा अकथ कहानी प्रेम की, जानत लैली खूब । दो तनहूँ जहँ एक ये, मन मिलाइ महबूब ॥३३॥ शब्दार्थ—अकथ=अकथ्य । लैली=लैला, मजनूं की प्रेमिका । महबूब= प्रेमी । अर्थ—प्रेम की कहानी अकथनीय है जिसे मजनू की प्रेमिका लैला अच्छी तरह जानती है । प्रेम वह वरदान है जो दो प्रेमियो के तन को तथा मन को मिलाकर एक कर देता है । दोहा दो मन इक होते सुन्यौ, पै वह प्रेम न आहि होइ जबै द्वै तनहुँ इक, सोई प्रेम कहाहि ॥३४॥ शब्दार्थ—आहि=है । अर्थ—प्रेम के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते है कि यद्यपि मैंने प्रेम मे दो मनो को एक होते हुए सुना है, लेकिन यह वास्तविक प्रेम नही है । जब दो शरीर एक हो जाते हैं, तो उसे ही प्रेम कहते हैं । 'प्रेमानन्द प्रकारेण द्वैत विस्मरणं गतम् ।' तुलना—१. 'आसिक-मासुक ह्वै गया, इश्क कहावै सोय । दादू उस मासूक का, अल्ला आसिक होय ॥'—दादूदयाल दोहा याही तें सब मुक्ति ते, लही बडाई प्रेम । प्रेम भए नसि जाहि सब, बँधे जगत के नेम ॥३५॥ शब्दार्थ—याही ते=इसी कारण से । लही=प्राप्त की । नसि जाहि= नष्ट हो जाते हैं । नेम=नियम । अर्थ—प्रेम मे दो शरीरो को एक करने की शक्ति होती है, इसी कारण से प्रेम ने मुक्ति से भी अधिक प्रशसा प्राप्त की है, अर्थात् प्रेम का स्थान मुक्ति