रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग ३३१ से भी ऊँचा है। प्रेम के होने पर संसार के सारे बँधे हुए नियम नष्ट हो जाते हैं, अर्थात् प्रेमी संसार के किसी भी नियम को नही मानता। दोहा हरि के सब आधीन पै, हरी प्रेम-अधीन। याही ते हरि आपुही, याहि बडप्पन दीन ॥३६॥ शब्दार्थ—सरल है। अर्थ—प्रेम भगवान से भी बडा है, इसी बात का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते है कि ससार के सब प्राणी भगवान के वश मे हैं, पर भगवान प्रेम के वश मे होते है। इसीलिए स्वय भगवान् से अपने-से अधिक प्रेम को महत्ता प्रदान की है। तुलना—१. 'हरि ब्रज जन आधीन है, ब्रजजन॒ हरि आधीन।'—नागरीदास २. 'स्वामी ते सेवक बडो, जो निज धर्म सुजान । राम बाँधि उतरे उदधि, लाँघि गए हनुमान ॥'—तुलसी दोहा वेद मूल सब धर्म यह, कहैं सबै स्रुतिसार। परम धर्म है ताहु ते, प्रेम एक अनिवार ॥३७॥ शब्दार्थ—स्रुतिसार=वेदो का तत्व । अनिवार=अनिवार्य । अर्थ—प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते है कि वेद सब धर्मो का मूल है, परन्तु प्रेम को श्रुतियो का तत्व कहा जाता हैं। इसलिए प्रेम परम धर्म और अनिवार्य तत्त्व है। जदपि जसोदानन्दन अरु ग्वाल-वाल सब धन्य । पै या जग मैं प्रेम कौ गोपी भई अनन्य ॥३८॥ शब्दार्थ—जसोदानन्दन = कृष्ण । अनन्य=अद्वितीय । अर्थ—प्रेम की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते है कि यद्यपि कृष्ण का प्रेम पाने से कृष्ण, ग्वाल-बाल आदि सब धन्य है, किन्तु इस ससार मे अत्यधिक प्रेमिका होने के कारण गोपियाँ अद्वितीय बन गई है; अर्थात् उनके समान कोई नही है। तुलना—'कविरा कविरा क्या कहै, जा जमुना के तीर । इक इक गोपी प्रेम पै, बहिगे कोटि कबीर ॥'—कबीर