रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३२ रसखान-ग्रन्थावली दोहा वा रस की कछु माधुरी, ऊधो लही सराहि । पावै बहुरि मिठास अरु, अब दूजो को आहि ॥३६॥ शब्दार्थ—वा रस की=प्रेमानन्द की । बहुरि=फिर । अर्थ—प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते है कि प्रेमानन्द का कुछ माधुर्य उद्धव ने सराह कर ग्रहण किया था। जो माधुर्य उद्धव को प्राप्त हो गया है, अब उस माधुर्य को फिर से कौन प्राप्त कर सकता है ? दोहा स्रवन कीरतन दरसनंहि, जो उपजत सोइ प्रेम । सुद्धासुद्ध विभेद तैं, द्वैविध ताके नेम ॥४०॥ शब्दार्थ—स्रवन=श्रवण, सुनना । सुद्धासुद्ध=शुद्ध और अशुद्ध । द्वैविध =दो प्रकार के । नेम=नियम । अर्थ—प्रेम के भेदो का निरुपण करते हुए रसखान कहते हैं कि जो प्रेम श्रवण, कीर्तन और दर्शन से उत्पन्न होता है, वही शुद्ध और अशुद्ध, निष्काम और सकाम, ये दो प्रकार के प्रेम होते हैं। दोहा स्वारथमूल अशुद्ध त्यौ, सुद्ध स्वभावऽनुकूल । नारदादि प्रस्तार करि, कियौ जाहि को तूल ॥४१॥ शब्दार्थ—स्वारथमूल=स्वार्थ-भावना से युक्त । स्वभावऽनुकूल=सहज भाव से । प्रस्तार करि=विस्तार से । तूल=विस्तार । अर्थ—प्रेम के दो भेद होते हैं—शुद्ध और अशुद्ध । शुद्ध और अशुद्ध प्रेम के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते हैं कि जो प्रेम स्वार्थ-भावना से युक्त होता है, उसे अशुद्ध प्रेम कहते है और जो सहज भाव से होता है, उसे शुद्ध प्रेम कहते हैं। नारद आदि महर्षियों ने इन दोनों प्रकार के प्रेमो का वर्णन विस्तार से किया है। दोहा रसमय स्वाभाविक बिना, स्वारथ अचल महान । सदा एकरस सुद्ध सोइ, प्रेम अहै रसखान ॥४२॥ शब्दार्थ—रसमय=आनन्द से पूर्ण । स्वाभाविक=सहज । एकरस= निरन्तर समान रहने वाला ।