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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग ३३३ अर्थ—शुद्ध प्रेम के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते हैं कि- जो प्रेम आनन्द से पूर्ण, सहज, निष्काम, अचल, महान् और निरन्तर समान- रहने वाला होता है, जो कभी घटता नहीं है, वह शुद्ध प्रेम कहलाता है। दोहा जाते उपजत प्रेम सोह, बीज कहावत प्रेम। जामैं उपजत प्रेम सोइ, क्षेत्र कहावत प्रेम ॥४३॥ शब्दार्थ—सरल है। अर्थ—प्रेम के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते हैं कि जिस कारण से प्रेम उत्पन्न होता है, उसे प्रेम का बीज कहते हैं और जो प्रेम का- आश्रय होता है, उसे प्रेम का क्षेत्र कहते हैं। दोहा जाते पनपत बढ़त अरु, फूलत फलत महान। सो सब प्रेमहि प्रेम यह, कहत रसिक रसखान ॥४४॥ शब्दार्थ—सरल है। अर्थ—प्रेम के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते हैं कि- जिससे प्रेम उत्पन्न होता है, बढ़ता है, फूलता तथा बढ़ता है और महान् बनता है, यह सब प्रेम ही होता है। दोहा वही बीज अंकुर वही, सेक वही आधार। डाल पात फल फूल सब, वही प्रेम सुखसार ॥४५॥ शब्दार्थ—सेक = सिंचन । अर्थ—प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि प्रेम ही- बीज है, वही अंकुर है, वही सिंचन है, वही आधार है, वही डाल, पात, फल, फूल और सुख का सार है। दोहा जो जाते जामैं बहुरि, जा हित कहियत बेष। सो सब प्रेमहि प्रेम है, जग रसखानि असेष ॥४६॥ शब्दार्थ—बहुरि=फिर। बेष=श्रेष्ठ। असेष=पूर्णरूप से। अर्थ—प्रेम की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते हैं कि जो, जिससे और फिर जिसमे जगत् का सौन्दर्य, श्रेयता, महत्ता, उत्कृष्टता आदि- गुण विद्यमान हैं, वे सब इस चराचर सृष्टि में प्रेम-रूप से भासित हैं।