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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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३३४ रसखान-ग्रन्थावली दोहा कारज कारन रूप सब, प्रेम एक रसखान । कर्ता कर्म क्रिया करन, गनिए प्रेम समान ॥४८॥ शब्दार्थ—कारज-कार्य। कारन-कारण, साधन। अर्थ—प्रेम की महत्ता एवं व्यापकता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि प्रेम ही जगत् का कारण है; अर्थात् जगत् की उत्पत्ति प्रेम से ही हुई है और जगत् की रचना रूप कार्य भी प्रेममय है। प्रेम ही कर्ता, कर्म, क्रिया और भगवान् का रूप है। दोहा देखि गदर हित-साहिबी, दिल्ली नगर मसान । छिनहिं बादसा-बंस की, ठसक छोड़ि रसखान ॥४९॥ शब्दार्थ—हित-साहिबी = प्रभुत्व के लिए। ठसक = झूठा गर्व। अर्थ—अपने जीवन की एक घटना का उल्लेख करते हुए रसखान कहते हैं कि दिल्ली में प्रभुत्व के लिए विप्लव देखकर तथा दिल्ली को उजड़ा हुआ देखकर, पठान बादशाहों के वंश का झूठा गर्व समाप्त होते देखकर मैंने दिल्ली छोड़ दी। दोहा प्रेम-निकेतन श्रीबनहिं, आइ गोबर्द्धन-धाम । लह्यो सरन चित चाहि कै, जुगल स्वरूप ललाम ॥५०॥ शब्दार्थ—प्रेम-निकेतन = प्रेम धाम। श्रीबनहिं = वृन्दावन में। गोबर्द्धन धाम = ब्रज का एक प्रसिद्ध स्थान। चित चाहि कै = ध्यानपूर्वक। जुगल- स्वरूप = राधा और कृष्ण का रूप। ललाम = सुन्दर। अर्थ—अपने वृन्दावन-निवास की घटना की ओर संकेत करते हुए रसखान कहते हैं कि दिल्ली छोड़कर मैं प्रेम-धाम वृन्दावन आ गया और गोवर्धन नामक स्थान पर बस गया और राधा-कृष्ण के सुन्दर रूप की श्रद्धापूर्वक शरण ग्रहण की; अर्थात् राधा-कृष्ण की भक्ति में तल्लीन हो गया। दोहा बोरि मानिनी नै दियो, बोरि मोहिनी-मान । प्रेम-रंग की गहिरता कहि, गुन निरखे रसखान ॥५१॥