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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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ऽदशाल्या भाग ३३५ शब्दार्थ—प्रेमदेव = कृष्ण । छविहि = शोभा को । अर्थ—कृष्ण-भक्ति की ओर अपना प्रेम प्रदर्शित करते हुए रसखान कहते है कि मान करने वाली नारी का हृदय तोडकर, अर्थात् उसके प्रेम के बंधनो को छोडकर और मन को मोहित करने वाली स्त्रियो के गर्व को चूर्ण करके तथा कृष्ण की शोभा को देखकर मुसलमान-धर्मावलम्बी रसखान कृष्ण-भक्ति मे तन्मय हो गये । दोहा बिधु सागर रस इन्दु सुभ, बरस सरस रसखान । प्रेम वाटिका रचि रुचिर, चिर हिय हरषि बखान ॥५१॥ शब्दार्थ—बिधु सागर रस इन्दु = सवत् १६७१ । रुचिर = सुन्दर । अर्थ—रसखान कहते है कि मैंने उल्लसित होकर इस सरस और सुन्दर प्रेम वाटिका की रचना शुभ वर्ष मे संवत् १६७१ वि० मे की । दोहा अरपी श्री हरि चरन जुग पुहुप पराग निहार । बिचरहिं या मैं रसिकबर, मधुकर निकर अपार ॥५२॥ शब्दार्थ—अरपी = अर्पित की । पुहुप पराग = कमल-केसर । मधुकर- निकर = भौरो का समूह । अर्थ—रसखान कहते है कि मैंने यह प्रेम-वाटिका श्रीकृष्ण के दोनो चरणो के कमल-केसर को देखकर उनको अर्पित की । आशा है कि अपार भौरो के समूह रूपी रसिकवर इसमे विचरण करेगे; अर्थात् इससे आनन्द प्राप्त करेगे । दोहा (शेष पूरण) राधा-माधव सखिन संग, बिरहत कुंज-कुटीर । रसिकराज रसखानि तहँ, कूजत कोइल कीर ॥५३॥ शब्दार्थ—माधव = कृष्ण । कोइल = कोयल । कीर = तोता । अर्थ—रसखान् कहते है कि राधा और कृष्ण अन्य सखियो के साथ कुंज- कुटीरो मे विचरण करे और वहाँ पर रसिकराज रसखान कोयल तथा तोते के रूप मे कूजता रहे ।