रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
पृष्ठ 351, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ें३३६ रसखान-ग्रन्थावली दानलीला सवैया आवत हो रस के चसके तुम जानत हौ रस होत कहा हो । नैसक वै रस भीजन दैहौ दिना दस के अलवेले लला हो । अत वही दिन आवेगे भूमि गुवालिन ही के जु संग सखा हो । ल्योगे कहा इन बातन तै घर जाव लला अब ही लरका हो ॥१०॥ शब्दार्थ—चसके=लोभ से । नैसक=थोड़ा-सा । लरका=अबोध । अर्थ—कोई गोपी कृष्ण की भर्त्सना करती हुई कहती है कि हे कृष्ण ! तुम मेरे पास रस के लोभ से आये हो, लेकिन तुम यह नही जानते कि रस क्या होता है ? अभी तो तुम दस दिन के अलवेले लड़के हो; अर्थात् अल्पायु के हो, अतः स्वयं को थोड़ा-सा रस मे तो भीगने दो; अर्थात् वह अवस्था तो आने दो, जब रसास्वादन का बोध हो पाता है । अंत मे वे ही दिन आ जायेंगे जब तुम ग्वालिनो के साथ घूमकर रस का आनन्द लोगे । अतः तुम अभी से इन बातों से क्या लोगे । तुम अभी अबोध हो, इसलिए अपने घर चले जाओ । सवैया आई हो आज नई ब्रज मे कछु नैन नचाइ कै रार मचैहौ । जानति हौ हमही छलि कै दधि बेचन जाव सो जान न पैहौ । लैहौ चुकाह सबै तुम सो रसखानि भले मन मैं पछतैहौ । जो तुम होहु बड़े घर की अइलात कहा हौ जगात न दैहौ ॥२॥ शब्दार्थ—रार=झगड़ा । अइलात==गर्व करना । जगात=कर, टैक्स । अर्थ—गोपी की बाते सुनकर कृष्ण कहते हैं कि तुम अभी ब्रज मे नई- नई आई हो, इसीलिए आँखें नचाकर झगड़ा कर रही हो, अर्थात् तुम्हारा यह झगड़ा केवल दिखावे के लिए है, वास्तविक नहीं है । तुम चाहती हो कि हमे धोखा देकर तुम दही बेचने के लिए निकल जाओ, पर हम तुम्हे इस प्रकार नहीं जानें देगे । रसखान कहते हैं कि चाहे तुम अपने मन मे जितना पछतावा करो, पर हम तुमसे सब कर वसूल कर लेंगे । यदि तुम किसी बड़े घर की हो तो इसमे गर्व करने की भी कोई बात नहीं है, क्योकि तुम्हारा कर न देने का आग्रह व्यर्थ है; अर्थात् चाहे तुम जितने बड़े घर की हो, हम बिना कर लिए तुम्हे नही छोड़ें ।