रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
पृष्ठ 352, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग ३३७ सवैया सुनिकै यह वात हिये गुनि कै तब बोलि उठि वृषभान-लली । कहौ कान्ह अजान भए वन मे कहूँ माँगत दान कि छेकि गली ॥ मग आइ कै जाइ रिसाइ कहा तुम एकऊ वात कही न भली । हम है वृषभानपुरा की लली अव गोरस वेचन जात चली ॥३॥ शब्दार्थ—गुनि कै = सोचकर । वृषभान-लली = राधा । गोरस = दही । अर्थ—कृष्ण की बाते सुनकर और उन्हे अपने हृदय मे सोचकर राधा कहती हे कि हे कृष्ण ! आज तुम अजान बन गये हो, जो बन मे हमारा मार्ग रोकते हो । तुम हमारा मार्ग ही रोकना चाहते हो, अथवा कुछ माँगना चाहते हो । मार्ग मे आकर और अपनी इच्छा पूरी न हो सकने के कारण तुम क्रोधित होकर क्यो जाते हो ? तुमने तो एक भी वात ठीक नही कही । हम राजा वृषभानु की पुत्री है और अब दही बेचने के लिए जा रही है । तुम्हारे रोके से हम नही रुक सकती । सवैया एरी कहा वृषभानुपुरा की तौ दान दिये बिन जान न पैहौ । जौ दधि-माखन देव जू चाखन भूमत लाखन या मग ऐहौ । नाहिं तौ जो रस सो रस लैहौ जु गोरस बेचन फेरि न जैहौ । नाहक नारि तू रारि बढावति गारि दिये फिरि आपहि दैहौ ॥४॥ शब्दार्थ—लाखन = लाखो बार । नाटक = व्यर्थ मे । आपहि दैहौ = आप भी खायोगी । अर्थ—राधा की चुनौती सुनकर कृष्ण कहते है कि तुम मुझे वृषभानु की पुत्री होने का क्या भय दिखाती हो ? मै विना कर दिये तुम्हे यहाँ से जाने न दूँगा । यदि तुम मुझे खाने के लिए दही और मक्खन दे दोगी, तो इस मार्ग से लाखो बार निशक होकर निकल जाओ, कोई तुम्हे कुछ न कहेगा । यदि तुम अपनी मरजी से मुझे गोरस नही दोगी तो जो तुम्हारे पास गोरस है, वह तो मै छीन ही लूँगा, और फिर तुम्हे इस मार्ग से कभी भी जाने नही दूँगा । हे नारी ! तुम व्यर्थ मे ही झगड़ा बढाती हो । यदि तुम मुझको गाली दोगी तो उनके बदले मे स्वयं भी गाली खाओगी ।