भारतकोश
रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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३३८ रसखान-ग्रन्थावली कवित्त गारी के देवैया वनवारी तुम कहौ कौन, हम तौं वृषभान की कुमारी सब जानो है । जोर तौ करौगे जाड जासो हरि पार पाइ, भुरही ते आज मो सो कैसो हठ ठानो है । बूझि देखौ मन माहि अरुझत मग जात, बूझिहौ निदान कान्ह जोन कहो मानो है । मेरे जान कोऊ मीरखान आवै दही छीनै, तू तौ है अहीर मोहि नाहिं पहिचानो है ॥५॥ शब्दार्थ-गारी = गाली । जोर = बल-प्रयोग । पार पाइ = पार पाना, कार्य की सिद्धि होना । भुरही ते = प्रातःकाल से ही । अरुझत = झगड़ना । मीरखान = राज्य ; उच्च अधिकारी । अर्थ-कृष्ण की बाते सुनकर राधा कहती है कि हे कृष्ण ! तुम गाली देने वाले कौन होते हो, अर्थात् तुम्हे गाली देने का क्या अधिकार है । सब लोग इस बात को जानते हैं कि हम राजा वृषभानु की पुत्री हैं और इसलिए हमे गाली देना आसान नही है । हे कृष्ण ! यदि बल-प्रयोग करना ही है तो उससे करो जिससे तुम्हारी कार्य-सिद्धि हो जाये । आज न जाने तुमने क्यो प्रातः काल से ही मेरे साथ झगडा शुरू कर दिया है । तुम अपने मन में सोचकर देख लो कि रास्ते मे किसी से भी झगडा करना उचित नही है । यदि तुम्हे मेरा विश्वास न हो तो जिसका तुम्हे विश्वास है, उसी से बात को पूछकर देख लो । मै तो यह जानती हूँ कि राज्य का कोई उच्च अधिकारी ही दही छीनने के लिए आ सकता है । पर तुम तो केवल अहीर हो; अर्थात् साधारण-सी जाति के पुत्र हो और तुम मुझे को नही पहिचान रहे हो । विशेष-व्यंग्यात्मकता के द्वारा प्रभावोत्कर्ष । कवित्त तोहूँ पहचानौं वृषभान हूँ को जानौ नेकु, काहू की न शका मानौं हौं अहीर ऐसो हौ । मीरन को मारि मान तोरिहौ गुमान लैहौ, आज तोसो दान लैहौ देखिये जु जैसो हो ।

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