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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग ३३६ फोरिहो मटूकी माट लै दही करौंगो लूट, जैहो कोने सु तौ घाट वाट रोके बैसौ हौं । कहा कहौं राधे तोहि अजहूँ न चीन्है मोहिं, मेरी ओर देखि नेकु दानी कान्ह कैसो हौं ॥ ६ ॥ शब्दार्थ – नेकु = तनिक भी। संका = डर। मीरन को = सरदारो को। गुमान = गर्व। मटूकी = मटकी, छोटा घड़ा। माट = घड़ा। बैसो हौं = बैठ गया हूँ। चीन्है = पहिचानना। दानी = कर (टैक्स) लेने वाला। अर्थ – राधा की बातें सुनकर कृष्ण कहते हैं कि हे राधा ! मै तुम्हे भी जानता हूँ और तेरे पिता वृषभानु को भी जानता हूँ, लेकिन मै ऐसा अहीर हूँ कि किसी का भी डर नही मानता। राज्य के सरदारों को मार कर जिनका तुम घमण्ड करती हो, तुम्हारा गर्व चूर्ण कर दूँगा। आज मैं तुमसे दान लेकर ही रहूँगा और फिर तुम्हे मेरी शक्ति का पता चलेगा। मैं तुम्हारे छोटे और बडे घडो को फोड़कर तुम्हारी दही को लूट लूँगा और फिर तुम चाहे जिससे शिकायत करो, मै इसी रास्ते पर बैठा हुआ हूँ, डर कर कही भागूँगा नही। हे राधा ! मै तुमसे क्या कहूँ ? तुम आज भी मुझे नही पहिचान रही हो। मेरी ओर तो देखो, तुम्हे पता चलेगा कि तुमसे कर लेने वाला कृष्ण कैसा है। कवित्त जोहौं मैं तिहारी ओर नन्दगाव के किसोर, माखन के चोर तुम गोकुल के बासी हौ । जसुदा तिहारी माड ऊखल सो बाँधो जाइ, दानी पै कहाइ आइ भए कामरासी हौ । कंस सो कहौगी जाइ माँगिहौं तुमै घराइ, रहौगे कहाँ छिपाइ जो बडे मवासी हौ । गोरस को दान हम आजहु न सुने कान, काहे लाल हम सो करत रोज रासी हौ ॥ ७ ॥ शब्दार्थ – जोहे = देखती हूँ। कामरासी = काम भावना से युक्त। तुमै घराइ = तुमको बन्दी बनाने के लिए। मवासी = सुरक्षित दुर्ग। अर्थ – कृष्ण की बाते सुनकर राधा कहती है कि हे कृष्ण ! मैं तुम्हारी ओर देखती हूँ और तुम्हे पहिचानती भी हूँ। तुम नन्द गाँव के युवक हो, मक्खन के चोर हो और गोकुल के निवासी हो। यशोदा, जिसने तुम्हे ऊखल