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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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३४० रसखान-ग्रन्थावली से बाँध दिया था, तुम्हारी मां है । आज तुम यहाँ आकर कर लेने वाले बन गये हो और काम भावना से युक्त हो गये हो । मैं कंस से तुम्हे वन्दी बनाने के लिए विनती करुँगी और फिर तुम सुरक्षित दुर्गों मे भी नही छिप सकोगे, क्योकि कंस तुम्हे वन्दी बनाकर ही रहेगा । हमने कभी यह नही सुना कि दही पर भी कर लगता है, अतः हमारे साथ प्रतिदिन परिहास करना ठीक नही है । कवित्त दान पै न कान सुने लैहो सो गुमान भंजि, हासी पर हासी परहासी आज करौंगो । जेती तुम ग्वालिन तितेक सब रोकि राखौं, जमुना की ओटि पै जु सबै काम सरौगो । जाको तू कहति कंस ताहि को करौ विधंस, हौं तौ जदुवंस वीर काहू सो न डरौगो । भूपन उत्तारि चीर फारिचीर डारि दैहौं, नन्द की दुहाई खात टेक सों न टरौगो ॥८॥ शब्दार्थ—भंजि = चूर्ण करना । सरौंगो = पूर्ण करूँगा । विधंस = विध्वंस । टेक सो = प्रण से । अर्थ—राधा की बाते सुनकर कृष्ण कहते है कि यदि तुम दान देने की बात को नही सुनोगी तो मै तुम्हारा गर्व चूर्ण कर दूँगा और तुम्हारी विविध प्रकार से हाँसी करूँगा । जितनी तुम ग्वालिन हो, उन सबको मै रोक लूँगा और यमुना की ओट मे अपने सब कार्यों को पूर्ण करूँगा । जिस कंस की तुम मुझे धमकी दिखलाती हो, उसका नाश कर दूँगा । मैं यदुवंश का वीर हूँ, इसीलिए किसी से भी नहीं डरूँगा । तुम्हारे भूषणो को उतार कर तुम्हारे चीर के टुकडे टुकडे कर डालूँगा । मै नन्द बाबा की सौगन्ध खाकर कहता हूँ कि अपने प्रण से तनिक भी नही हटूंगा, अर्थात् प्रण पूरा करके रहूँगा । कवित्त नन्द की न दासी हम जातिहू मै नाही कम, एक गाँव बसौ स्याम भोर भए वादी हो । जमुना के तीर तुम चीर हू चुराइ रहौ, ताहू की न लाज आई ओर कि फसादी हो ।