भारतकोश
रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 356, कुल 368 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 356

व्याख्या भाग ३४१ रोकत हौ टोकत हौ वाट माहि साट खाह, माट फोरि चाटौ दही यही गुन आदी हौ । जौ कहूँ बैठारिहौ न पारिहौ रुआब माहि, नोन की न गोन ली है आदी हूँ न लादी हो ॥६॥ शब्दार्थ—भोर भए=भोले होकर । बादी=झगडालू । ओर के=भारी । फसादी=झगडा करने वाले । साट खाह=दूसरो का धन लूटना । आदी= स्वभाव वाले । रुआब=रौव । नोन=नमक । गोन=माल लादने की बोरी । आदी=आद्रक, अदरक । अर्थ—कृष्ण की बाते सुनकर राधा कहती है कि हे कृष्ण, न तो हम नन्द की दासी है, जिस प्रकार तुम हो और न तुमसे जाति मे ही कम है । हम सब एक ही गाँव के रहने वाले है, लेकिन तुम भोले बनकर भी झगडालू हो, अर्थात् केवल देखने मे ही भोले दिखाई देते हो, अन्यथा तुम तो स्वभाव से झगडालू हो । तुमने यमुना के किनारे पर जाकर स्नान करती हुई गोपियो के वस्त्र चुरा लिये थे । इस अधम कार्य को करके भी तुम्हे लज्जा नहीं आई । तुम तो भारी झगडा करने वाले हो । दूसरो का धन लूटने के लिए तुम उनका रास्ता रोकते हो, उन्हे टोकते हो । तुम्हारा अब यह स्वभाव बन गया है कि तुम घडा फोडकर दही खाने वाले बन गये हो । जो तुम्हे कही बैठाया जाये तो तुम रौव भी नही दिखा सकते, अर्थात् तुम्हारा व्यक्तित्व भी प्रभावशाली नही है । फिर यह भी समझ लो कि हम गोन मे नमक और अदरक भरकर लादने के आदी नही है, अर्थात् हम कोई साधारण व्यापारी नही हैं, यदि तुम हमें छेडोगे तो तुम्हे इसका बहुत मूल्य देना पडेगा । कवित्त मेरो को करै नियाव हौ तो तीनि लोक राव, हमै घेरी माँटी चाव दाव भलो पायौ है । बृंदावन कुज माँह कदम की छाँह चलौ, अंक भरि भेटि लैहौ जैसो मन भायौ है । हीरा मनि मानिक की काँच और पोतिन की । मोतिन की गात की जगाती हौ लगायौ है । गोरस तौ ढेर ढेर खाहु पीयौ बेर बेर, देखहु सलोनो रूप दानी कान्ह आयौ है ॥१०॥