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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

३३४ रसखान-ग्रन्थावली दोहा कारज कारन रूप सब, प्रेम एक रसखान । कर्ता कर्म क्रिया करन, गनिए प्रेम समान ॥४८॥ शब्दार्थ—कारज-कार्य। कारन-कारण, साधन। अर्थ—प्रेम की महत्ता एवं व्यापकता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि प्रेम ही जगत् का कारण है; अर्थात् जगत् की उत्पत्ति प्रेम से ही हुई है और जगत् की रचना रूप कार्य भी प्रेममय है। प्रेम ही कर्ता, कर्म, क्रिया और भगवान् का रूप है। दोहा देखि गदर हित-साहिबी, दिल्ली नगर मसान । छिनहिं बादसा-बंस की, ठसक छोड़ि रसखान ॥४९॥ शब्दार्थ—हित-साहिबी = प्रभुत्व के लिए। ठसक = झूठा गर्व। अर्थ—अपने जीवन की एक घटना का उल्लेख करते हुए रसखान कहते हैं कि दिल्ली में प्रभुत्व के लिए विप्लव देखकर तथा दिल्ली को उजड़ा हुआ देखकर, पठान बादशाहों के वंश का झूठा गर्व समाप्त होते देखकर मैंने दिल्ली छोड़ दी। दोहा प्रेम-निकेतन श्रीबनहिं, आइ गोबर्द्धन-धाम । लह्यो सरन चित चाहि कै, जुगल स्वरूप ललाम ॥५०॥ शब्दार्थ—प्रेम-निकेतन = प्रेम धाम। श्रीबनहिं = वृन्दावन में। गोबर्द्धन धाम = ब्रज का एक प्रसिद्ध स्थान। चित चाहि कै = ध्यानपूर्वक। जुगल- स्वरूप = राधा और कृष्ण का रूप। ललाम = सुन्दर। अर्थ—अपने वृन्दावन-निवास की घटना की ओर संकेत करते हुए रसखान कहते हैं कि दिल्ली छोड़कर मैं प्रेम-धाम वृन्दावन आ गया और गोवर्धन नामक स्थान पर बस गया और राधा-कृष्ण के सुन्दर रूप की श्रद्धापूर्वक शरण ग्रहण की; अर्थात् राधा-कृष्ण की भक्ति में तल्लीन हो गया। दोहा बोरि मानिनी नै दियो, बोरि मोहिनी-मान । प्रेम-रंग की गहिरता कहि, गुन निरखे रसखान ॥५१॥

ऽदशाल्या भाग ३३५ शब्दार्थ—प्रेमदेव = कृष्ण । छविहि = शोभा को । अर्थ—कृष्ण-भक्ति की ओर अपना प्रेम प्रदर्शित करते हुए रसखान कहते है कि मान करने वाली नारी का हृदय तोडकर, अर्थात् उसके प्रेम के बंधनो को छोडकर और मन को मोहित करने वाली स्त्रियो के गर्व को चूर्ण करके तथा कृष्ण की शोभा को देखकर मुसलमान-धर्मावलम्बी रसखान कृष्ण-भक्ति मे तन्मय हो गये । दोहा बिधु सागर रस इन्दु सुभ, बरस सरस रसखान । प्रेम वाटिका रचि रुचिर, चिर हिय हरषि बखान ॥५१॥ शब्दार्थ—बिधु सागर रस इन्दु = सवत् १६७१ । रुचिर = सुन्दर । अर्थ—रसखान कहते है कि मैंने उल्लसित होकर इस सरस और सुन्दर प्रेम वाटिका की रचना शुभ वर्ष मे संवत् १६७१ वि० मे की । दोहा अरपी श्री हरि चरन जुग पुहुप पराग निहार । बिचरहिं या मैं रसिकबर, मधुकर निकर अपार ॥५२॥ शब्दार्थ—अरपी = अर्पित की । पुहुप पराग = कमल-केसर । मधुकर- निकर = भौरो का समूह । अर्थ—रसखान कहते है कि मैंने यह प्रेम-वाटिका श्रीकृष्ण के दोनो चरणो के कमल-केसर को देखकर उनको अर्पित की । आशा है कि अपार भौरो के समूह रूपी रसिकवर इसमे विचरण करेगे; अर्थात् इससे आनन्द प्राप्त करेगे । दोहा (शेष पूरण) राधा-माधव सखिन संग, बिरहत कुंज-कुटीर । रसिकराज रसखानि तहँ, कूजत कोइल कीर ॥५३॥ शब्दार्थ—माधव = कृष्ण । कोइल = कोयल । कीर = तोता । अर्थ—रसखान् कहते है कि राधा और कृष्ण अन्य सखियो के साथ कुंज- कुटीरो मे विचरण करे और वहाँ पर रसिकराज रसखान कोयल तथा तोते के रूप मे कूजता रहे ।

३३६ रसखान-ग्रन्थावली दानलीला सवैया आवत हो रस के चसके तुम जानत हौ रस होत कहा हो । नैसक वै रस भीजन दैहौ दिना दस के अलवेले लला हो । अत वही दिन आवेगे भूमि गुवालिन ही के जु संग सखा हो । ल्योगे कहा इन बातन तै घर जाव लला अब ही लरका हो ॥१०॥ शब्दार्थ—चसके=लोभ से । नैसक=थोड़ा-सा । लरका=अबोध । अर्थ—कोई गोपी कृष्ण की भर्त्सना करती हुई कहती है कि हे कृष्ण ! तुम मेरे पास रस के लोभ से आये हो, लेकिन तुम यह नही जानते कि रस क्या होता है ? अभी तो तुम दस दिन के अलवेले लड़के हो; अर्थात् अल्पायु के हो, अतः स्वयं को थोड़ा-सा रस मे तो भीगने दो; अर्थात् वह अवस्था तो आने दो, जब रसास्वादन का बोध हो पाता है । अंत मे वे ही दिन आ जायेंगे जब तुम ग्वालिनो के साथ घूमकर रस का आनन्द लोगे । अतः तुम अभी से इन बातों से क्या लोगे । तुम अभी अबोध हो, इसलिए अपने घर चले जाओ । सवैया आई हो आज नई ब्रज मे कछु नैन नचाइ कै रार मचैहौ । जानति हौ हमही छलि कै दधि बेचन जाव सो जान न पैहौ । लैहौ चुकाह सबै तुम सो रसखानि भले मन मैं पछतैहौ । जो तुम होहु बड़े घर की अइलात कहा हौ जगात न दैहौ ॥२॥ शब्दार्थ—रार=झगड़ा । अइलात==गर्व करना । जगात=कर, टैक्स । अर्थ—गोपी की बाते सुनकर कृष्ण कहते हैं कि तुम अभी ब्रज मे नई- नई आई हो, इसीलिए आँखें नचाकर झगड़ा कर रही हो, अर्थात् तुम्हारा यह झगड़ा केवल दिखावे के लिए है, वास्तविक नहीं है । तुम चाहती हो कि हमे धोखा देकर तुम दही बेचने के लिए निकल जाओ, पर हम तुम्हे इस प्रकार नहीं जानें देगे । रसखान कहते हैं कि चाहे तुम अपने मन मे जितना पछतावा करो, पर हम तुमसे सब कर वसूल कर लेंगे । यदि तुम किसी बड़े घर की हो तो इसमे गर्व करने की भी कोई बात नहीं है, क्योकि तुम्हारा कर न देने का आग्रह व्यर्थ है; अर्थात् चाहे तुम जितने बड़े घर की हो, हम बिना कर लिए तुम्हे नही छोड़ें ।

व्याख्या भाग ३३७ सवैया सुनिकै यह वात हिये गुनि कै तब बोलि उठि वृषभान-लली । कहौ कान्ह अजान भए वन मे कहूँ माँगत दान कि छेकि गली ॥ मग आइ कै जाइ रिसाइ कहा तुम एकऊ वात कही न भली । हम है वृषभानपुरा की लली अव गोरस वेचन जात चली ॥३॥ शब्दार्थ—गुनि कै = सोचकर । वृषभान-लली = राधा । गोरस = दही । अर्थ—कृष्ण की बाते सुनकर और उन्हे अपने हृदय मे सोचकर राधा कहती हे कि हे कृष्ण ! आज तुम अजान बन गये हो, जो बन मे हमारा मार्ग रोकते हो । तुम हमारा मार्ग ही रोकना चाहते हो, अथवा कुछ माँगना चाहते हो । मार्ग मे आकर और अपनी इच्छा पूरी न हो सकने के कारण तुम क्रोधित होकर क्यो जाते हो ? तुमने तो एक भी वात ठीक नही कही । हम राजा वृषभानु की पुत्री है और अब दही बेचने के लिए जा रही है । तुम्हारे रोके से हम नही रुक सकती । सवैया एरी कहा वृषभानुपुरा की तौ दान दिये बिन जान न पैहौ । जौ दधि-माखन देव जू चाखन भूमत लाखन या मग ऐहौ । नाहिं तौ जो रस सो रस लैहौ जु गोरस बेचन फेरि न जैहौ । नाहक नारि तू रारि बढावति गारि दिये फिरि आपहि दैहौ ॥४॥ शब्दार्थ—लाखन = लाखो बार । नाटक = व्यर्थ मे । आपहि दैहौ = आप भी खायोगी । अर्थ—राधा की चुनौती सुनकर कृष्ण कहते है कि तुम मुझे वृषभानु की पुत्री होने का क्या भय दिखाती हो ? मै विना कर दिये तुम्हे यहाँ से जाने न दूँगा । यदि तुम मुझे खाने के लिए दही और मक्खन दे दोगी, तो इस मार्ग से लाखो बार निशक होकर निकल जाओ, कोई तुम्हे कुछ न कहेगा । यदि तुम अपनी मरजी से मुझे गोरस नही दोगी तो जो तुम्हारे पास गोरस है, वह तो मै छीन ही लूँगा, और फिर तुम्हे इस मार्ग से कभी भी जाने नही दूँगा । हे नारी ! तुम व्यर्थ मे ही झगड़ा बढाती हो । यदि तुम मुझको गाली दोगी तो उनके बदले मे स्वयं भी गाली खाओगी ।

३३८ रसखान-ग्रन्थावली कवित्त गारी के देवैया वनवारी तुम कहौ कौन, हम तौं वृषभान की कुमारी सब जानो है । जोर तौ करौगे जाड जासो हरि पार पाइ, भुरही ते आज मो सो कैसो हठ ठानो है । बूझि देखौ मन माहि अरुझत मग जात, बूझिहौ निदान कान्ह जोन कहो मानो है । मेरे जान कोऊ मीरखान आवै दही छीनै, तू तौ है अहीर मोहि नाहिं पहिचानो है ॥५॥ शब्दार्थ-गारी = गाली । जोर = बल-प्रयोग । पार पाइ = पार पाना, कार्य की सिद्धि होना । भुरही ते = प्रातःकाल से ही । अरुझत = झगड़ना । मीरखान = राज्य ; उच्च अधिकारी । अर्थ-कृष्ण की बाते सुनकर राधा कहती है कि हे कृष्ण ! तुम गाली देने वाले कौन होते हो, अर्थात् तुम्हे गाली देने का क्या अधिकार है । सब लोग इस बात को जानते हैं कि हम राजा वृषभानु की पुत्री हैं और इसलिए हमे गाली देना आसान नही है । हे कृष्ण ! यदि बल-प्रयोग करना ही है तो उससे करो जिससे तुम्हारी कार्य-सिद्धि हो जाये । आज न जाने तुमने क्यो प्रातः काल से ही मेरे साथ झगडा शुरू कर दिया है । तुम अपने मन में सोचकर देख लो कि रास्ते मे किसी से भी झगडा करना उचित नही है । यदि तुम्हे मेरा विश्वास न हो तो जिसका तुम्हे विश्वास है, उसी से बात को पूछकर देख लो । मै तो यह जानती हूँ कि राज्य का कोई उच्च अधिकारी ही दही छीनने के लिए आ सकता है । पर तुम तो केवल अहीर हो; अर्थात् साधारण-सी जाति के पुत्र हो और तुम मुझे को नही पहिचान रहे हो । विशेष-व्यंग्यात्मकता के द्वारा प्रभावोत्कर्ष । कवित्त तोहूँ पहचानौं वृषभान हूँ को जानौ नेकु, काहू की न शका मानौं हौं अहीर ऐसो हौ । मीरन को मारि मान तोरिहौ गुमान लैहौ, आज तोसो दान लैहौ देखिये जु जैसो हो ।

व्याख्या भाग ३३६ फोरिहो मटूकी माट लै दही करौंगो लूट, जैहो कोने सु तौ घाट वाट रोके बैसौ हौं । कहा कहौं राधे तोहि अजहूँ न चीन्है मोहिं, मेरी ओर देखि नेकु दानी कान्ह कैसो हौं ॥ ६ ॥ शब्दार्थ – नेकु = तनिक भी। संका = डर। मीरन को = सरदारो को। गुमान = गर्व। मटूकी = मटकी, छोटा घड़ा। माट = घड़ा। बैसो हौं = बैठ गया हूँ। चीन्है = पहिचानना। दानी = कर (टैक्स) लेने वाला। अर्थ – राधा की बातें सुनकर कृष्ण कहते हैं कि हे राधा ! मै तुम्हे भी जानता हूँ और तेरे पिता वृषभानु को भी जानता हूँ, लेकिन मै ऐसा अहीर हूँ कि किसी का भी डर नही मानता। राज्य के सरदारों को मार कर जिनका तुम घमण्ड करती हो, तुम्हारा गर्व चूर्ण कर दूँगा। आज मैं तुमसे दान लेकर ही रहूँगा और फिर तुम्हे मेरी शक्ति का पता चलेगा। मैं तुम्हारे छोटे और बडे घडो को फोड़कर तुम्हारी दही को लूट लूँगा और फिर तुम चाहे जिससे शिकायत करो, मै इसी रास्ते पर बैठा हुआ हूँ, डर कर कही भागूँगा नही। हे राधा ! मै तुमसे क्या कहूँ ? तुम आज भी मुझे नही पहिचान रही हो। मेरी ओर तो देखो, तुम्हे पता चलेगा कि तुमसे कर लेने वाला कृष्ण कैसा है। कवित्त जोहौं मैं तिहारी ओर नन्दगाव के किसोर, माखन के चोर तुम गोकुल के बासी हौ । जसुदा तिहारी माड ऊखल सो बाँधो जाइ, दानी पै कहाइ आइ भए कामरासी हौ । कंस सो कहौगी जाइ माँगिहौं तुमै घराइ, रहौगे कहाँ छिपाइ जो बडे मवासी हौ । गोरस को दान हम आजहु न सुने कान, काहे लाल हम सो करत रोज रासी हौ ॥ ७ ॥ शब्दार्थ – जोहे = देखती हूँ। कामरासी = काम भावना से युक्त। तुमै घराइ = तुमको बन्दी बनाने के लिए। मवासी = सुरक्षित दुर्ग। अर्थ – कृष्ण की बाते सुनकर राधा कहती है कि हे कृष्ण ! मैं तुम्हारी ओर देखती हूँ और तुम्हे पहिचानती भी हूँ। तुम नन्द गाँव के युवक हो, मक्खन के चोर हो और गोकुल के निवासी हो। यशोदा, जिसने तुम्हे ऊखल

३४० रसखान-ग्रन्थावली से बाँध दिया था, तुम्हारी मां है । आज तुम यहाँ आकर कर लेने वाले बन गये हो और काम भावना से युक्त हो गये हो । मैं कंस से तुम्हे वन्दी बनाने के लिए विनती करुँगी और फिर तुम सुरक्षित दुर्गों मे भी नही छिप सकोगे, क्योकि कंस तुम्हे वन्दी बनाकर ही रहेगा । हमने कभी यह नही सुना कि दही पर भी कर लगता है, अतः हमारे साथ प्रतिदिन परिहास करना ठीक नही है । कवित्त दान पै न कान सुने लैहो सो गुमान भंजि, हासी पर हासी परहासी आज करौंगो । जेती तुम ग्वालिन तितेक सब रोकि राखौं, जमुना की ओटि पै जु सबै काम सरौगो । जाको तू कहति कंस ताहि को करौ विधंस, हौं तौ जदुवंस वीर काहू सो न डरौगो । भूपन उत्तारि चीर फारिचीर डारि दैहौं, नन्द की दुहाई खात टेक सों न टरौगो ॥८॥ शब्दार्थ—भंजि = चूर्ण करना । सरौंगो = पूर्ण करूँगा । विधंस = विध्वंस । टेक सो = प्रण से । अर्थ—राधा की बाते सुनकर कृष्ण कहते है कि यदि तुम दान देने की बात को नही सुनोगी तो मै तुम्हारा गर्व चूर्ण कर दूँगा और तुम्हारी विविध प्रकार से हाँसी करूँगा । जितनी तुम ग्वालिन हो, उन सबको मै रोक लूँगा और यमुना की ओट मे अपने सब कार्यों को पूर्ण करूँगा । जिस कंस की तुम मुझे धमकी दिखलाती हो, उसका नाश कर दूँगा । मैं यदुवंश का वीर हूँ, इसीलिए किसी से भी नहीं डरूँगा । तुम्हारे भूषणो को उतार कर तुम्हारे चीर के टुकडे टुकडे कर डालूँगा । मै नन्द बाबा की सौगन्ध खाकर कहता हूँ कि अपने प्रण से तनिक भी नही हटूंगा, अर्थात् प्रण पूरा करके रहूँगा । कवित्त नन्द की न दासी हम जातिहू मै नाही कम, एक गाँव बसौ स्याम भोर भए वादी हो । जमुना के तीर तुम चीर हू चुराइ रहौ, ताहू की न लाज आई ओर कि फसादी हो ।

व्याख्या भाग ३४१ रोकत हौ टोकत हौ वाट माहि साट खाह, माट फोरि चाटौ दही यही गुन आदी हौ । जौ कहूँ बैठारिहौ न पारिहौ रुआब माहि, नोन की न गोन ली है आदी हूँ न लादी हो ॥६॥ शब्दार्थ—भोर भए=भोले होकर । बादी=झगडालू । ओर के=भारी । फसादी=झगडा करने वाले । साट खाह=दूसरो का धन लूटना । आदी= स्वभाव वाले । रुआब=रौव । नोन=नमक । गोन=माल लादने की बोरी । आदी=आद्रक, अदरक । अर्थ—कृष्ण की बाते सुनकर राधा कहती है कि हे कृष्ण, न तो हम नन्द की दासी है, जिस प्रकार तुम हो और न तुमसे जाति मे ही कम है । हम सब एक ही गाँव के रहने वाले है, लेकिन तुम भोले बनकर भी झगडालू हो, अर्थात् केवल देखने मे ही भोले दिखाई देते हो, अन्यथा तुम तो स्वभाव से झगडालू हो । तुमने यमुना के किनारे पर जाकर स्नान करती हुई गोपियो के वस्त्र चुरा लिये थे । इस अधम कार्य को करके भी तुम्हे लज्जा नहीं आई । तुम तो भारी झगडा करने वाले हो । दूसरो का धन लूटने के लिए तुम उनका रास्ता रोकते हो, उन्हे टोकते हो । तुम्हारा अब यह स्वभाव बन गया है कि तुम घडा फोडकर दही खाने वाले बन गये हो । जो तुम्हे कही बैठाया जाये तो तुम रौव भी नही दिखा सकते, अर्थात् तुम्हारा व्यक्तित्व भी प्रभावशाली नही है । फिर यह भी समझ लो कि हम गोन मे नमक और अदरक भरकर लादने के आदी नही है, अर्थात् हम कोई साधारण व्यापारी नही हैं, यदि तुम हमें छेडोगे तो तुम्हे इसका बहुत मूल्य देना पडेगा । कवित्त मेरो को करै नियाव हौ तो तीनि लोक राव, हमै घेरी माँटी चाव दाव भलो पायौ है । बृंदावन कुज माँह कदम की छाँह चलौ, अंक भरि भेटि लैहौ जैसो मन भायौ है । हीरा मनि मानिक की काँच और पोतिन की । मोतिन की गात की जगाती हौ लगायौ है । गोरस तौ ढेर ढेर खाहु पीयौ बेर बेर, देखहु सलोनो रूप दानी कान्ह आयौ है ॥१०॥

३४२ रसखान-ग्रन्थावली शब्दार्थ—नियाव = न्याय। राव = राजा। अंक भरि = बाहुपाश मे बाँध कर। मोतिन की = माला के मनकों की। जगात = कर। अर्थ—राधा की बाते सुनकर कृष्ण कहते है कि मेरा न्याय कौन कर सकता है, क्योकि मै तीनो लोको का राजा हूँ अर्थात् मैं तो स्वय ही सबसे बड़ा हूँ। तुम इसी कारण उल्लसित होकर यही दाव देखकर फेर लेती हो। तुम वृन्दावन के कुंजो मे उत्पन्न कदम्ब के रथो की छाया मे चलो और जैसा मैं चाहता हूँ, वहाँ तुम्हे बाहुपाश मे लूँगा। मैने हीरा, मणि, मानिक, बाँध, पनके और मोती जैसे तुम्हारे शरीर पर कर लगाना है। गोरस तो मैने अनेक बार अत्यधिक मात्रा मे खाया-पिया है, अब तुम यह समझ लो कि मै तुम्हारे सुन्दर शरीर से कर वसूल करने आया हूँ। सवैया नौ लख गाय सुनी हम नन्द के तापर दूध दही न अघाने। माँगत भीख फिरौ वन ही वन झूठी ही बातन के पन पाने॥ और की नारिन के मुख जोवत लाज गहौ कछु होहु सयाने। जाहु भले जु चले घर जाहु चले बस जाउ वृन्दावन जाने॥१९१॥ शब्दार्थ—नौ लख = नौ लाख। अघाने = तृप्त हुए। जोवत = देखना। होहु सयाने = होश मे आकर। जाने = जानती है। अर्थ—कृष्ण की बाते सुनकर राधा कहती है कि हे कृष्ण! मैने सुना हैं कि नद के नौ लाख गाये है, फिर भी तुम उनको दूध दही खाकर तृप्त नही हुए। तुम वन-बन मे झूठी बाते बनाकर भीख माँगते फिरते हो। तुम दूसरों की स्त्रियो के मुह देखते फिरते हो। तुम्हारा यह कार्य नही है, अतः होश मे आकर कुछ शरम करो। अच्छा यही है कि तुम वृन्दावन अपने घर चले जाओ, क्योकि हम तुम्हे भली प्रकार जानते है।

स्फुट पद तू एसी चतुराई ठानैं, काहे को निकसत या गैल । गैल कहा तेरे बाबा की, हम निकसी का पहिल पहैल । यह पैडो सबहिन चलिबे को, काहे को तू रोकत छैल । रसखान के प्रभु सूधो चलि जा, देहुँ उरहनौ नद महैल ॥१॥ शब्दार्थ—गैल=रास्ता । पहिल पहैल=प्रथम रास्ता । पैडो रास्ता । उरहनौ=उपालम्भ, शिकायत । नंद महैल=नदमहिर । अर्थ—मार्ग मे जाते हुए किसी गोपी को कृष्ण ने छेड दिया । वह कृष्ण को बुरा-भला कहने लगी । इस पर कृष्ण ने कहा कि यदि अपने मन मे इतनी होशियार बनती है तो इस रास्ते से निकलती ही क्यो हैं ? इस पर गोपी कहती है कि यह रास्ता न तो तेरे बाबा का है और न हम प्रथम बार ही इससे जा रही हैं, पहले भी इस रास्ते से निकल चुकी है । रास्ता तो सभी के चलने के लिए है अत हे छैला ! तुम रास्ता क्यो रोकते हो ? हैं रसखान के प्रभु ! हमे छोडकर या तो सीधे-सीधे यहाँ से चले जाओ, वरना तुम्हारी शिकायत नन्दमहिर से कर देगी । गारी खायगौ अरे गँवार ? ऐसी कौन सिखाई तोहै, पकरत आप पराई नार ? जा जा गोरस ले पिबैया, कौन है तू मग रोकनहार ? एती बरजोरी ना कीजै, मोहन सीख दई सत बार । खीजि मटुकिया झटकि सुपटकी, गोरस बहि-बहि चल्यौ पनार ? रसखान के प्रभु आज जान दै, कल आऊगी यहै करार ॥२॥ शब्दार्थ—गँवार=धृष्ट । गोरस=दही । वरजोरी=छीना-झपटी । सीख=शिक्षा । सतबार=सैकड़ो बार । खीजि=क्रोधित होकर । पनार=नाली । अर्थ—कोई गोपी दही बेचने के लिए जा रही थी । रास्ते मे कृष्ण मिल गये और उससे छेड़खानी करने लगे । इस पर गोपी ने कहा कि हे ३४३

३४४ रसखान-ग्रन्थावली धूर्त कृष्ण ! तुम मुझ से छेड़खानी क्यो करते हो ? क्या तुम मुझ से गाली खाना चाहते हो ? तुम्हे पराई स्त्री को छेड़ने की शिक्षा किसने दी है ? जाओ यहाँ से चले जाओ । तुम जैसे दही खाने वाले अनेक देखे हैं। मेरा रास्ता रोकने वाले होते कौन हो । हे मोहन मै तुमको सैकडो बार समझा चुकी हूँ कि तुम्हारी ऐसी छीना-झपटी करनी ठीक नही है । यह सुनकर कृष्ण को क्रोध आ गया और क्रोधित होकर उन्होने उस गोपी की दही की मटकी झटक कर पृथ्वी पर फेक दी जिससे वह फूट गई और दही नाली में बढ़-बढ़कर चलने लगी । तब गोपी ने उनसे प्रार्थना की कि हे रसखान के प्रभु ! आज तो मुझे जाने दो । मै वचन देती हूँ कि कल अवश्य आऊँगी । वाही दिन वारां बानक बनि, आयौ सखि आज । गावत तेरी रुचि भावती, संग , लिये मुघर समाज । सासु ननद की कानि करौ जनि, उठ किन खेली फाग । अखियाँ सखियाँ सुफल करी किन, इन नैनन के भाग ॥ कान परी जब तान मोहिनी, तबहुँ तजी कुल कानि ॥ इतरु हमी वृषभान-नंदिनी, उतरु हँसे रसखानि ॥ ३ ॥ शब्दार्थ-वाही दिन वारी = उसी दिन की तरह । बानक बनि = वेषभूषा सजाकर । मुघर = सुन्दर । कानि = भय जनि = मत । किन = क्यो नही । इतरु = इधर । वृषभान-नंदिनी = राधा । रसखानि = कृष्ण । अर्थ-कोई गोपी अपनी सखियो को फाग खेलने के लिए प्रेरित करती हुई कहती है कि हे सखियो ! कृष्ण ने आज फिर उसी दिन वाली वेष-भूषा धारण करके अपने शरीर को सजाया है । वह अपने साथ अपने साथियो का सुन्दर समाज लेकर तेरे प्रेम के गीत गाता है । अब तुम अपनी सास और ननदो का भय मत करो और उठकर फाग खेलो । हे सखियो ! यह अवसर बड़े सौभाग्य से मिला है, अत कृष्ण के साथ फाग खेलकर अपनी आंखो को सफल करो । जब कृष्ण की मनोहरतान हमने सुनी थी तभी हमने अपने कुल की मर्यादा को छोड़ दिया था । इधर राधा कृष्ण को देखकर हँसी और उधर कृष्ण राधा को देखकर हँसे । आज होरी रे मोहन होरी ! कालि हमारे आँगन गारी, दे आयौ सो को री ॥ अब का दुरि बैठे मैया ∙ ढिंग, निकसो कुन्ज विहारी ।

व्याख्या भाग ३४५ उमँगि-उमँगि आई गोकुल की, सकल मही धनधारी । जब ललना ललकारि निकासे, रूप सुधा की प्यारी । लिपटि गई घनस्याम लाल सो, चमक चमक चपला सी ॥ काजर देउ जु परि भरुवा के, सबै देहु मिलि गारी । कहि रसखान एक गारी पै, सौ आदर वलिहारी ॥ ४ ॥ शब्दार्थ—कालि=कल । दुरि=छिपकर । ललना=गोपी । चपला= बिजली । भरुवा =भड़वा, विभिन्न वेशधारी । अर्थ—गोपियाँ कृष्ण के घर जाती है और कृष्ण को होली खेलने के लिए ललकारती हुई कहती है कि हे मोहन ! आज होली है, कल तुम हमारे घर जाकर गालीदे आये थे और आज अपनी माँ के पास छिपकर बैठ गये हो । हे कुन्ज- बिहारी ! बाहर निकलो । देखो, गोकुल की समस्त वैभव वाली पृथ्वी उमग गई है, अर्थात् चारो ओर मादक वातावरण छाया हुआ है । जब कृष्ण के सौन्दर्य- अमृत की प्यासी गोपियो ने कृष्ण को बाहर निकाल लिया तो वे उससे बिजली की तरह लिपट गई । तब वे कहने लगी कि सब मिलकर इस भड़वा को (कृष्ण को) काला कर दो और इसे गाली दो ! रसखान कहते है कि उनकी एक गाली पर सौ आदरो को निछावर किया जा सकता है । विशेष-उपमा अलकार । मैं कैसे निकसो मोहन खेलै फाग । मेरे सँग की सब गयी, मोहि प्रगट्यौ अनुराग ॥ एक रैनि सपनो भयौ, नन्द-नदन मिल्यौ आइ । मैं सकुचन घूँघट पर्यौ, (उन) भुज मेरी लपटाइ ॥ अपनौ रस मो को दयौ, मेरो लीनो घूँटि । बैरिन पलकैं खुल गयी, (मेरी) गई आस सब टूटि । फिरि मै बहुतैरी करी, नेकु न लागी आँखि । पलक मूँदि परिचौ लियो, (मैं) जाम एक लौं राखि । मेरे ता दिन ह्वै गयौ, होरी डाडो रोपि । सास ननद देखन गई, मौहि घर वासौ सोपि ॥ सास उसासन भारुई ननद खरी अनखाय । देवर डग धरिवो गनै,(मेरो) बोलत नाहु रिसाय ॥ तिखने चढि ठाडी रहूँ, लैन करू कनहेर ।

३४६ रसखान ग्रन्थावली राति द्यौस हौसे रहे, का मुरली की टेर ॥ क्यो करि मन धीरज धरू, उठति अतिहि अकुलाय । कठिन हियौ फाटै नही, तिल भर दुख न समाय ॥ ऐसी मन मे आवई, छांडि लाज कुल कानि । जाय मिलो वृज ईस सो, रति नायक रसखानि ॥५॥ शब्दार्थ -अनुराग =प्रेम । रस=आनन्द । परिचौ=परिचय, प्रतीक्षा ।' जाम=काल, प्रहर । डाडो रोपि=ड डा गाड दिया । वासी=घर, सामान ।' अनखाय=क्रोधित होता है । तिखने=तिमजिले पर । कनहेर=दर्शन की उत्सुकता । अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! मैं घर से बाहर कैसे निकलूं, क्योकि बाहर कृष्ण फाग खेल रहे हैं । मेरे साथ की सारी सखियाँ चली गई है, पर मैं नही गयी, क्योकि मेरे मन मे कृष्ण के प्रति प्रेम उत्पन्न हो गया है । हे सखि ! एक दिन स्वप्न मे मै कृष्ण से मिली । उस मिलन वेला मे मैंने तो सकोच से घूंघट कर लिया, पर उन्होने अपनी भुजाएँ फैलाकर मुझे अपने बाहु-पास मे बाँध लिया । उन्होने अपना आनन्द मुझे दिया और मेरा स्वयं ले लिया । तभी मेरी आँखे खुल गयी और सब आशा टूट गई । फिर मैने सोने का बहुत प्रयत्न किया पर फिर मुझे नीद न आई । एक प्रहर तक आँखे मू दकर मैं नीद की प्रतीक्षा करती रही और देखे हुए दृश्य को आँखो मे भुलाती रही । उसी दिन से कृष्ण के साथ होली खेलने का मेरे ऊपर प्रतिवध लग गया । मुझे घर और घर का सामान सौंप कर सास ननद स्वय तो होली खेलने चली गयी, पर मुझे नही जाने दिया । कृष्ण के प्रति मेरे प्रेम को जान- कर सास तो मुझे दुख देती रहती है, और ननद अत्यन्त अप्रसन्न रहती है । देवर मेरे आने-जाने की पूरी चौकसी करता रहता है, पति क्रोधित होकर बाते करता है । कृष्ण का तनिक सा दर्शन पाने के लिए मै तिमजिले पर खडी रहती हूँ और रात-दिन उनकी मुरली की ध्वनि सुनकर प्रसन्न रहती हूँ । मैं अपने मन मे किस प्रकार धैर्य धारण कर सकती हूँ, क्योंकि कृष्ण की याद आते ही मेरा मन अत्यधिक व्याकुल हो जाता है । मेरा हृदय इतना कठोर है कि वह वियोग-दुख से फटता भी तो नही है और इतना कोमल है कि इसमे तिल भर दुख भी नही समा पाता । मेरे मन मे तो यह बात आती है कि मैं लज्जा और कुल-मर्यादा छोड़कर रति-नायक, ब्रज केअधिपति कृष्ण से जा मिलूँ ।

संदिग्ध छंद सवैया हेरत कुँज भुजा धरे स्याम सो नैक तबै हँसती न लुगाई । लाज़ न कानि हुती जिय माँझ सु मेटत जौ मग माँह कन्हाई । हेरेँ परै न गुपाल सखी इन जोबन आनि कुचाल चलाई । होय कहा अब के पछिताएँ जौ हाथ ते छुटि गई लहिकाई ॥१॥ शब्दार्थ-- हेरत=देखते हुए। कानि=मर्यादा। लरिकाई=लडकपन,. बचपन । अर्थ--कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त करती हुई कहती है कि हे सखि ! बचपन मे जब मै कृष्ण के ऊपर कुंज मे अपनी भुजाओ को रख लेती थी, अर्थात् उसे बाहु-पाश मे बाँध लेती थी तो उस घटना को देखते हुए भी अन्य स्त्रियाँ तनिक भी नही हँसती थी, मेरा परिहास नही करती थी । यदि कृष्ण मार्ग मे मिल जाता था तो मै निस्संकोच भाव से उससे मिलती थी । तब मेरे मन मे न तो लज्जा होती और न कुल की मर्यादा का कोई भाव होता था । हे सखि अब मोहन के आने पर मै चाहते हुए भी कृष्ण को नही देख पाती । यह मोहन तो मेरे लिए इतना कटु अपिशाप बन गया है । लेकिन अब बचपन बीत गया तो अब पछताने से क्या होता है । विशेष--गोपी के सरल भाव का स्वाभाविक वर्णन है । कवित्त चीर की चटक औ लटक नव कुंडल की, भौंह की मटक नेह आँखिन दिखाउ रे । मोहन सुजान गुरू-रूप के निधान फेरि, बाँसुरी बजाई तनु-तपन सिराउ रे ॥ ३४७

३४८ रसखान-ग्रन्थावली एहो बनवारी बलिहारी जाउँ तेरी अजु, मेरी कुंज आड नेक मीठी तान गाउ रे। नंद के किसोर चितचोर मोर पखवारे, बंसीवारे सावरे पियारे इत आउ रे ॥२॥ शब्दार्थ—चटक=शोभा। नेह=स्नेह, प्रेम। निधान=भंडार। तनु- तपन=शरीर का दुख। सिराउ=ठंडा करना। नेक=तनिक। अर्थ—कोई गोपी कृष्ण से प्रार्थना कर रही है कि हे कृष्ण ! अपने वस्त्रों की शोभा और नवीन कुंडलों के इधर-उधर हिलने की शोभा, भौंहों की मटक और अपनी आँखों में भरा हुआ प्रेम मुझे दिखाओ। हे मोहन ! तुम सुजान हो, गुण और सौन्दर्य के भण्डार हो, फिर से बाँसुरी बजाकर मेरे शरीर के दुख को ठंडा करो। हे बनवारी ! मैं आज तुम पर बलिहारि होती हूँ। मेरे कुंज में आकर तनिक बाँसुरी की मीठी तान सुनाओ। हे नंदनंदन, चित्त को चुराने वाले, मोर-मुकुट धारण करने वाले, बंशी वाले श्यामवर्ण प्रियतम, इधर आओ, अर्थात् मेरे पास आकर मेरा वियोग-दुख दूर करो। तट की न घट भरै मग की न पग धरै, घर की न कछु करै बैठी भरै साँसु री। एकै सुनि लोट गई एकै लोट पोट भई, एकनि के दृगनि निकसि आए आँसु री। कहै रसखान सो सबै ब्रज वनिता वधि, वधिक कहाय हाय भई कुल हाँसुरी। करिये उपाय बाँस डारियै कटाय, नाहिं, उपजैगौ बाँस नाँहि बजै फेरि बाँसुरी ॥ ३ ॥ शब्दार्थ—घट=घड़ा। मग=मार्ग। दृगनि=आँखों में। हाँसु=हंसी। अर्थ—कृष्ण की बाँसुरी के प्रभाव का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! जब कृष्ण ने बाँसुरी बजाई तो ब्रज की समस्त गोपियाँ किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो गई। जो गोपी जल भरने के लिए गई थी, वह यमुना के किनारे पर ही खड़ी रह गई। जो मार्ग में जा रही थी, उसके आगे पैर चले नहीं। जो घर में थी वह अपना कार्य छोड़कर केवल लम्बे-लम्बे सांस लेने लगी। एक गोपी बाँसुरी की ध्वनि को सुनकर पृथ्वी पर अचेत

व्याख्या भाग ~३४६ होकर लोट गई, एक लोट-पोट हो गई एक की आखो से आँसू निकल आए । रसखान कहते है इस प्रकार ब्रज की गोपियो की भी हँसी हुई क्योकि उन्होने अपनी कुल की मर्यादा का कोई ध्यान नहीं रखा बाँसुरी के इस भयकर प्रभाव से बचने का तो केवल यही उपाय है कि इस ससार क सारे बाँसो का कटवा दिया जाये, क्योकि न बाँस होगा और न बाँसुरी बजेगी ! विशेष--लोकोक्ति अलकार । कवित्त भिक्षुक तिहारो कहाँ वलि मख शाला जहाँ, सर्पन को सगी कहाँ ह्वै है छीरनिधि मे ! ऐरी बहुरगी बैल वारौ कहाँ नाचत है, कीने तिरभग, कही ह्वै है ग्वालन मे । चाउर चवैया कहाँ है सुदामा पास, विष को अहारी कहाँ पूतना के घर मे। सिंधु-सुता आन मिली तर्क सो तरक करी, गिरिजा मुसकाति जाति झारी लिए कर मे ॥४॥ शब्दार्थ—वलि मख-शाला जहाँ = जहाँ पर राजा बलि की यज्ञशाला है । छीरनिधि = क्षीरसागर, विष्णु का निवास-स्थान, कृष्ण को विष्णु का अव- तार माना जाता है। तिरभगा = त्रिभगी होकर । पूतना = एक राक्षसी, जिसे कृष्ण ने बचपन मे मारा था। सिन्धु-सुता = लक्ष्मी । तर्क से तर्क करी = तर्क के द्वारा पराजित कर दिया । गिरिजा = पार्वती झारी = जलपात्र । अर्थ—पार्वती जल का पात्र लेकर जा रही थी । मार्ग मे उन्हे लक्ष्मी मिली । उसने शिव का परिहास करने के लिए पार्वती से कुछ प्रश्न किये, परन्तु पार्वती ने उनके उत्तर कृष्ण से (विष्णु के अवतार से) सम्बद्ध कर दिये । इस प्रकार पार्वती ने अपने पति के गौरव की भी रक्षा की और लक्ष्मी को अपने तर्को से पराजित कर दिया । प्रश्न और उत्तर इस प्रकार हैं ! प्रश्न—तुम्हा भिक्षुक कहाँ है ? (गोपी का शिव से तात्पर्य है।) उत्तर—जहाँ राजा बलि की यज्ञशाला है । (कृष्ण राजा बलि के पास वामन का रूप धारण करके दान माँगने गये थे ।) प्रश्न—सर्पों का साथी कहाँ है ? (शिव के गले मे सर्प है ।) उत्तर—क्षीर सागर मे। (विष्णु क्षीर सागर मे शेषनाग की शैया बनाकर निवास करते हैं। कृष्ण को विष्णु का अवतार माना गया है ।) प्रश्न—अरी, मै पूछती हूँ कि वह बहुरेंगी बैल वाला कहाँ नाच रहा है ।, (शिव की सवारी नाँदी बैल है और शिव का ताण्डव नृत्य लोक प्रसिद्ध है ।)

३५० रसखान-ग्रन्थावली उत्तर—तीन भंगिमाएं बनाकर ग्वाल-समूह के मध्य । प्रश्न—चावलो को चावने वाला कहाँ है ? (शिव वैभव से दूर रहकर कठोर योगी का जीवन बिताते है।) उत्तर--सुदामा के पास । (कृष्ण ने सुदामा के चावल खाये थे ।) प्रश्न--वह विष खाने वाला कहा है ? (शिव ने देवताओ की रक्षा के लिए क्षीर सागर से निकले हुए विष का पान किया था।) उत्तर--पूतना के घर मे । (पूतना राक्षसी अपने स्तनो से विष लगाकर बालक कृष्ण को मारने आई थी।) इस प्रकार जल-पात्र लेकर जाती हुई पार्वती ने अपने तर्को से लक्ष्मी को पराजित कर दिया । सवैया खेलिये फाग निसक ह्वै आज मयक मुखी कहै भाग हमारो । लेहु गुलाल दुग्रौ कर मे पित्र काटिक रंग हिये महं डारो । भावै सु मोहि करो रसखान जु पाँव परौ जनि घूंघट टारो ॥ वीर की सौंह हौं देखिहौं कैसे अबीर तो आँख बचाय के डारो ॥५॥ शब्दार्थ—निसक ह्वै = निडर होकर। मयंकमुखी = चन्द्रमुखी। दुग्रौ = दोनो। भावै = जो अच्छा लगे । पाव परी जनि घूंघट टारो = मैं तुम्हारे पैरों मे पडकर प्रार्थना करती हूँ कि मेरा घूंघट मत खोलो । वीर = भाई । सौह = सौगंध । अर्थ--फाग खेलते समय कोई चन्द्रमुखी गोपी कृष्ण से कहती है कि हे कृष्ण ! हम दोनो को फाग खेलने का अवसर मिला है, यह हमारा सौभाग्य है, अत तुम निडर होकर फाग खेलो। दोनो हाथो मे गुलाल लेकर और पिचकारी मे रंग भरकर मेरे ऊपर डालो । जो अच्छा लगे, उसी प्रकार मेरे साथ फाग खेलो, पर मैं तुमसे पैरो मे पडकर प्रार्थना करती हूँ कि मेरा घूंघट मत खोलो । मैं भाई की सौगन्ध खाकर कहती हूँ कि मेरी आँखो को बचाकर मेरे ऊपर अबीर डालो, वरना आखो मे अबीर पड जाने से मै किस प्रकार तुम्हारे सौन्दर्य को देख सकूँगी ? दोहा नन्द महर कै वगर तन, ऊव मेरे को जाय । नाहक कहुँ गढि जायगो, हित काँटो मन पाय ॥ ६ ॥ शब्दार्थ--वगर = आँगन । मेरे को जाये = मेरी बलाय जाये । = नाहक व्यर्थ मे ही । हित = प्रेम । मन-पाय = मन रूपी चरण मे । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि नन्द मिहिर के आँगन

व्याख्या भाग ३५१ मे अब मेरी बलाय जाय अर्थात् मै वहाँ बिल्कुल नही जाऊगी क्यो वहाँ व्यर्थ ही मन रूपी चरण मे प्रेम रूपा काँटा गड़ जायेगा अर्थात् कृष्ण से प्रेम हो जायेगा । विशेष—रूपक अलकार । कवित्त सुरतरु लतानि चार फल है ललित कैधो, कामधेनु धारा सम नेह उपजावनी । कैधो चिन्तामनि की माल उर सोभित, बिसाल कठ मे धरै है जोति भलकावनी ॥ प्रभु की कहानी ते गुसाईं की मधुरबानी, मुक्ति सुखदानी रसखानि मनभावनी । खाड की खिजावनी सी कठ की कुढावनी सी, सिता को सतावनी सी सुधा सकुचावनी ॥ ७ ॥ शब्दार्थ—सुरतर=कल्पवृक्ष । चार फल=धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष । ललित=सुन्दर , नेह=स्नेह । सिता=शर्करा, चीनी । अर्थ—इस कवित्त मे राम-कथा के महत्व का वर्णन किया गया है । यह राम कथा कल्पवृक्ष की शाखाओ की भाँति धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार सुन्दर फल देने वाली है या कामधेनु की दुग्ध धारा के समान पवित्र और निर्मल प्रेम को उत्पन्न करने वाली है या हृदय पर चिन्तामणि माला के समान सुशोभित होने वाली है या विशाल कण्ठ मे दिव्य ज्योति के समान भलकने वाली है राम की कथा से गोस्वामी तुलसीदास की वाणी मुक्ति सुख आनन्द देने वाली बनकर मनोहर हो गई । राम-कथा खाँड कन्द शरीर की भाँति मीठी और अमृत के समान अलौकिक आनन्द प्रदान करने वाली है । विशेष—सन्देह, उल्लेख अलकार । अग भभूत लगाय महा सुख है कोउ ऐसौ सो प्रेमहु पागै । नाथ को नाम सुनै विगसै हियो कान्ह को नाम सुनै अनुरागे । जोग लिये हरि प्यारी मिलैतो मै कान फटाये कहा दुख लागै । मोहन के मन मानी यही तो सबै री कहो मिलि गोरख जागै ॥ ८ ॥ शब्दार्थ-भभूत=भस्म । नाथ=गोरखनाथ । विगसैहियौ=हृदय प्रसन्न हो जाता है । अनुरागे=प्रेम पूर्ण हो जाता है । अर्थ—उद्धव के निर्गुण ब्रह्म उपदेश को सुनकर कोई गोपी उद्धव से कहती हैं कि कृष्ण के प्रेम मे निमग्न हुआ क्या कोई ऐसा प्राणी है जो यह कहे कि अगो मे भस्म लगाने से महासुख की प्राप्ति होती है । गोरखनाथ का नाम सुनकर हृदय प्रसन्न हो जाता है परन्तु कृष्ण का नाम सुनने पर

मन प्रेमपूर्ण हो जाता है । यदि योग धारण करने से प्यारा कृष्ण मिल जाय तो हमे अपने कान फटवा लेने से भी कोई दुख नही अर्थात् हम सहर्ष अपने कान फटवा सकती है । यदि कृष्ण की यही इच्छा है कि हम उन्हे छोड़कर योग साधना शुरू कर दे तो हे सखि ! सब आजायो और मिलकर गोरखनाथ का अलख जगाओ । कैसा यह देस निगोरा, जग होरी ब्रज होरा । मैं जल जमना भरन जात रही, देखि बडन मेरा गोरा । मोसो कहै चलो कुंजन मे, तनक-तनक से छोरा । परे आँखिन मे डोरा ॥ जिमरा देखि डरात सखी री, लाज भरम को ओरा । का बूढे का लोग लुगाई, एक ते एक ठिठोरा । न काहू सो काहू को जोरा । मन मेरो हर्यो नद के ने सखि,चलत लगावत चोरा । कहै रसखान सिखाइ सखन सो, सब मेरा अग टटोरा । न मानत कहत निहोरा ॥ ६ ॥ शब्दार्थ—निहोरा = निगोडा तनक तनक सो = छोटे छोटे । डोरा = काजल । ठिठोरा = धृष्ट । निहोरा = विनय । अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से कह रही है कि हे सखि ! यह निगोडा देश कैसा है और ब्रज तो सारे जग से बढकर है । मैं यमुना मे पानी भरने के लिए जा रही थी कि मेरे गोरे शरीर को देखकर मेरे सौन्दर्य पर रीझ कर, छोटे-छोटे बच्चे भी जो आँखों मे काजल लगाए हुए थे, मुझ से कहने लगे कि कुन्जो मे चलो । उन्हें देखकर मेरा मन डर गया, लज्जा सकट मे पड गई । क्या बूढे, क्या लोग और स्त्रियाँ, यहाँ ब्रज मे तो सब एक-दूसरे से बढ़-चढकर धृष्ट हैं, कोई किसी से के जोड़े मे नही आता, अर्थात् सभी अनुप- मेय है। हे सखि ! मेरा मन कृष्ण ने हर लिया है, वह चोरी-चोरी मेरे पीछे चलता है और अपने सब साथियो को सिखा कर मेरी तलाशी लिवा लेता है । उससे चाहे कितनी विनय करो, पर वह किसी की कोई बात नही सुनता । दोहा परम चतुर पुनि रसिकवर, कैसो हू नर होय । विना प्रेम रूखो लगै , वादि चतुरई सोम ॥ १० ॥ शब्दार्थर्—सिकवर = भावुक । वादि = व्यर्थ । चतुराई = चतुरता । अर्थ-इस दोहे मे कृष्ण-प्रेम की महत्व का वर्णन किया गया गया है । चाहे मनुष्य कितना ही चतुर और भावुक हो परन्तु यदि उसमे कृष्ण के प्रति प्रेम नही है तो वह नीरस है और उसकी सारी चतुराई व्यर्थ है ।

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