रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४६ रसखान ग्रन्थावली राति द्यौस हौसे रहे, का मुरली की टेर ॥ क्यो करि मन धीरज धरू, उठति अतिहि अकुलाय । कठिन हियौ फाटै नही, तिल भर दुख न समाय ॥ ऐसी मन मे आवई, छांडि लाज कुल कानि । जाय मिलो वृज ईस सो, रति नायक रसखानि ॥५॥ शब्दार्थ -अनुराग =प्रेम । रस=आनन्द । परिचौ=परिचय, प्रतीक्षा ।' जाम=काल, प्रहर । डाडो रोपि=ड डा गाड दिया । वासी=घर, सामान ।' अनखाय=क्रोधित होता है । तिखने=तिमजिले पर । कनहेर=दर्शन की उत्सुकता । अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! मैं घर से बाहर कैसे निकलूं, क्योकि बाहर कृष्ण फाग खेल रहे हैं । मेरे साथ की सारी सखियाँ चली गई है, पर मैं नही गयी, क्योकि मेरे मन मे कृष्ण के प्रति प्रेम उत्पन्न हो गया है । हे सखि ! एक दिन स्वप्न मे मै कृष्ण से मिली । उस मिलन वेला मे मैंने तो सकोच से घूंघट कर लिया, पर उन्होने अपनी भुजाएँ फैलाकर मुझे अपने बाहु-पास मे बाँध लिया । उन्होने अपना आनन्द मुझे दिया और मेरा स्वयं ले लिया । तभी मेरी आँखे खुल गयी और सब आशा टूट गई । फिर मैने सोने का बहुत प्रयत्न किया पर फिर मुझे नीद न आई । एक प्रहर तक आँखे मू दकर मैं नीद की प्रतीक्षा करती रही और देखे हुए दृश्य को आँखो मे भुलाती रही । उसी दिन से कृष्ण के साथ होली खेलने का मेरे ऊपर प्रतिवध लग गया । मुझे घर और घर का सामान सौंप कर सास ननद स्वय तो होली खेलने चली गयी, पर मुझे नही जाने दिया । कृष्ण के प्रति मेरे प्रेम को जान- कर सास तो मुझे दुख देती रहती है, और ननद अत्यन्त अप्रसन्न रहती है । देवर मेरे आने-जाने की पूरी चौकसी करता रहता है, पति क्रोधित होकर बाते करता है । कृष्ण का तनिक सा दर्शन पाने के लिए मै तिमजिले पर खडी रहती हूँ और रात-दिन उनकी मुरली की ध्वनि सुनकर प्रसन्न रहती हूँ । मैं अपने मन मे किस प्रकार धैर्य धारण कर सकती हूँ, क्योंकि कृष्ण की याद आते ही मेरा मन अत्यधिक व्याकुल हो जाता है । मेरा हृदय इतना कठोर है कि वह वियोग-दुख से फटता भी तो नही है और इतना कोमल है कि इसमे तिल भर दुख भी नही समा पाता । मेरे मन मे तो यह बात आती है कि मैं लज्जा और कुल-मर्यादा छोड़कर रति-नायक, ब्रज केअधिपति कृष्ण से जा मिलूँ ।