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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग ३४५ उमँगि-उमँगि आई गोकुल की, सकल मही धनधारी । जब ललना ललकारि निकासे, रूप सुधा की प्यारी । लिपटि गई घनस्याम लाल सो, चमक चमक चपला सी ॥ काजर देउ जु परि भरुवा के, सबै देहु मिलि गारी । कहि रसखान एक गारी पै, सौ आदर वलिहारी ॥ ४ ॥ शब्दार्थ—कालि=कल । दुरि=छिपकर । ललना=गोपी । चपला= बिजली । भरुवा =भड़वा, विभिन्न वेशधारी । अर्थ—गोपियाँ कृष्ण के घर जाती है और कृष्ण को होली खेलने के लिए ललकारती हुई कहती है कि हे मोहन ! आज होली है, कल तुम हमारे घर जाकर गालीदे आये थे और आज अपनी माँ के पास छिपकर बैठ गये हो । हे कुन्ज- बिहारी ! बाहर निकलो । देखो, गोकुल की समस्त वैभव वाली पृथ्वी उमग गई है, अर्थात् चारो ओर मादक वातावरण छाया हुआ है । जब कृष्ण के सौन्दर्य- अमृत की प्यासी गोपियो ने कृष्ण को बाहर निकाल लिया तो वे उससे बिजली की तरह लिपट गई । तब वे कहने लगी कि सब मिलकर इस भड़वा को (कृष्ण को) काला कर दो और इसे गाली दो ! रसखान कहते है कि उनकी एक गाली पर सौ आदरो को निछावर किया जा सकता है । विशेष-उपमा अलकार । मैं कैसे निकसो मोहन खेलै फाग । मेरे सँग की सब गयी, मोहि प्रगट्यौ अनुराग ॥ एक रैनि सपनो भयौ, नन्द-नदन मिल्यौ आइ । मैं सकुचन घूँघट पर्यौ, (उन) भुज मेरी लपटाइ ॥ अपनौ रस मो को दयौ, मेरो लीनो घूँटि । बैरिन पलकैं खुल गयी, (मेरी) गई आस सब टूटि । फिरि मै बहुतैरी करी, नेकु न लागी आँखि । पलक मूँदि परिचौ लियो, (मैं) जाम एक लौं राखि । मेरे ता दिन ह्वै गयौ, होरी डाडो रोपि । सास ननद देखन गई, मौहि घर वासौ सोपि ॥ सास उसासन भारुई ननद खरी अनखाय । देवर डग धरिवो गनै,(मेरो) बोलत नाहु रिसाय ॥ तिखने चढि ठाडी रहूँ, लैन करू कनहेर ।