रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४४ रसखान-ग्रन्थावली धूर्त कृष्ण ! तुम मुझ से छेड़खानी क्यो करते हो ? क्या तुम मुझ से गाली खाना चाहते हो ? तुम्हे पराई स्त्री को छेड़ने की शिक्षा किसने दी है ? जाओ यहाँ से चले जाओ । तुम जैसे दही खाने वाले अनेक देखे हैं। मेरा रास्ता रोकने वाले होते कौन हो । हे मोहन मै तुमको सैकडो बार समझा चुकी हूँ कि तुम्हारी ऐसी छीना-झपटी करनी ठीक नही है । यह सुनकर कृष्ण को क्रोध आ गया और क्रोधित होकर उन्होने उस गोपी की दही की मटकी झटक कर पृथ्वी पर फेक दी जिससे वह फूट गई और दही नाली में बढ़-बढ़कर चलने लगी । तब गोपी ने उनसे प्रार्थना की कि हे रसखान के प्रभु ! आज तो मुझे जाने दो । मै वचन देती हूँ कि कल अवश्य आऊँगी । वाही दिन वारां बानक बनि, आयौ सखि आज । गावत तेरी रुचि भावती, संग , लिये मुघर समाज । सासु ननद की कानि करौ जनि, उठ किन खेली फाग । अखियाँ सखियाँ सुफल करी किन, इन नैनन के भाग ॥ कान परी जब तान मोहिनी, तबहुँ तजी कुल कानि ॥ इतरु हमी वृषभान-नंदिनी, उतरु हँसे रसखानि ॥ ३ ॥ शब्दार्थ-वाही दिन वारी = उसी दिन की तरह । बानक बनि = वेषभूषा सजाकर । मुघर = सुन्दर । कानि = भय जनि = मत । किन = क्यो नही । इतरु = इधर । वृषभान-नंदिनी = राधा । रसखानि = कृष्ण । अर्थ-कोई गोपी अपनी सखियो को फाग खेलने के लिए प्रेरित करती हुई कहती है कि हे सखियो ! कृष्ण ने आज फिर उसी दिन वाली वेष-भूषा धारण करके अपने शरीर को सजाया है । वह अपने साथ अपने साथियो का सुन्दर समाज लेकर तेरे प्रेम के गीत गाता है । अब तुम अपनी सास और ननदो का भय मत करो और उठकर फाग खेलो । हे सखियो ! यह अवसर बड़े सौभाग्य से मिला है, अत कृष्ण के साथ फाग खेलकर अपनी आंखो को सफल करो । जब कृष्ण की मनोहरतान हमने सुनी थी तभी हमने अपने कुल की मर्यादा को छोड़ दिया था । इधर राधा कृष्ण को देखकर हँसी और उधर कृष्ण राधा को देखकर हँसे । आज होरी रे मोहन होरी ! कालि हमारे आँगन गारी, दे आयौ सो को री ॥ अब का दुरि बैठे मैया ∙ ढिंग, निकसो कुन्ज विहारी ।