रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्फुट पद तू एसी चतुराई ठानैं, काहे को निकसत या गैल । गैल कहा तेरे बाबा की, हम निकसी का पहिल पहैल । यह पैडो सबहिन चलिबे को, काहे को तू रोकत छैल । रसखान के प्रभु सूधो चलि जा, देहुँ उरहनौ नद महैल ॥१॥ शब्दार्थ—गैल=रास्ता । पहिल पहैल=प्रथम रास्ता । पैडो रास्ता । उरहनौ=उपालम्भ, शिकायत । नंद महैल=नदमहिर । अर्थ—मार्ग मे जाते हुए किसी गोपी को कृष्ण ने छेड दिया । वह कृष्ण को बुरा-भला कहने लगी । इस पर कृष्ण ने कहा कि यदि अपने मन मे इतनी होशियार बनती है तो इस रास्ते से निकलती ही क्यो हैं ? इस पर गोपी कहती है कि यह रास्ता न तो तेरे बाबा का है और न हम प्रथम बार ही इससे जा रही हैं, पहले भी इस रास्ते से निकल चुकी है । रास्ता तो सभी के चलने के लिए है अत हे छैला ! तुम रास्ता क्यो रोकते हो ? हैं रसखान के प्रभु ! हमे छोडकर या तो सीधे-सीधे यहाँ से चले जाओ, वरना तुम्हारी शिकायत नन्दमहिर से कर देगी । गारी खायगौ अरे गँवार ? ऐसी कौन सिखाई तोहै, पकरत आप पराई नार ? जा जा गोरस ले पिबैया, कौन है तू मग रोकनहार ? एती बरजोरी ना कीजै, मोहन सीख दई सत बार । खीजि मटुकिया झटकि सुपटकी, गोरस बहि-बहि चल्यौ पनार ? रसखान के प्रभु आज जान दै, कल आऊगी यहै करार ॥२॥ शब्दार्थ—गँवार=धृष्ट । गोरस=दही । वरजोरी=छीना-झपटी । सीख=शिक्षा । सतबार=सैकड़ो बार । खीजि=क्रोधित होकर । पनार=नाली । अर्थ—कोई गोपी दही बेचने के लिए जा रही थी । रास्ते मे कृष्ण मिल गये और उससे छेड़खानी करने लगे । इस पर गोपी ने कहा कि हे ३४३