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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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संदिग्ध छंद सवैया हेरत कुँज भुजा धरे स्याम सो नैक तबै हँसती न लुगाई । लाज़ न कानि हुती जिय माँझ सु मेटत जौ मग माँह कन्हाई । हेरेँ परै न गुपाल सखी इन जोबन आनि कुचाल चलाई । होय कहा अब के पछिताएँ जौ हाथ ते छुटि गई लहिकाई ॥१॥ शब्दार्थ-- हेरत=देखते हुए। कानि=मर्यादा। लरिकाई=लडकपन,. बचपन । अर्थ--कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त करती हुई कहती है कि हे सखि ! बचपन मे जब मै कृष्ण के ऊपर कुंज मे अपनी भुजाओ को रख लेती थी, अर्थात् उसे बाहु-पाश मे बाँध लेती थी तो उस घटना को देखते हुए भी अन्य स्त्रियाँ तनिक भी नही हँसती थी, मेरा परिहास नही करती थी । यदि कृष्ण मार्ग मे मिल जाता था तो मै निस्संकोच भाव से उससे मिलती थी । तब मेरे मन मे न तो लज्जा होती और न कुल की मर्यादा का कोई भाव होता था । हे सखि अब मोहन के आने पर मै चाहते हुए भी कृष्ण को नही देख पाती । यह मोहन तो मेरे लिए इतना कटु अपिशाप बन गया है । लेकिन अब बचपन बीत गया तो अब पछताने से क्या होता है । विशेष--गोपी के सरल भाव का स्वाभाविक वर्णन है । कवित्त चीर की चटक औ लटक नव कुंडल की, भौंह की मटक नेह आँखिन दिखाउ रे । मोहन सुजान गुरू-रूप के निधान फेरि, बाँसुरी बजाई तनु-तपन सिराउ रे ॥ ३४७