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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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३४८ रसखान-ग्रन्थावली एहो बनवारी बलिहारी जाउँ तेरी अजु, मेरी कुंज आड नेक मीठी तान गाउ रे। नंद के किसोर चितचोर मोर पखवारे, बंसीवारे सावरे पियारे इत आउ रे ॥२॥ शब्दार्थ—चटक=शोभा। नेह=स्नेह, प्रेम। निधान=भंडार। तनु- तपन=शरीर का दुख। सिराउ=ठंडा करना। नेक=तनिक। अर्थ—कोई गोपी कृष्ण से प्रार्थना कर रही है कि हे कृष्ण ! अपने वस्त्रों की शोभा और नवीन कुंडलों के इधर-उधर हिलने की शोभा, भौंहों की मटक और अपनी आँखों में भरा हुआ प्रेम मुझे दिखाओ। हे मोहन ! तुम सुजान हो, गुण और सौन्दर्य के भण्डार हो, फिर से बाँसुरी बजाकर मेरे शरीर के दुख को ठंडा करो। हे बनवारी ! मैं आज तुम पर बलिहारि होती हूँ। मेरे कुंज में आकर तनिक बाँसुरी की मीठी तान सुनाओ। हे नंदनंदन, चित्त को चुराने वाले, मोर-मुकुट धारण करने वाले, बंशी वाले श्यामवर्ण प्रियतम, इधर आओ, अर्थात् मेरे पास आकर मेरा वियोग-दुख दूर करो। तट की न घट भरै मग की न पग धरै, घर की न कछु करै बैठी भरै साँसु री। एकै सुनि लोट गई एकै लोट पोट भई, एकनि के दृगनि निकसि आए आँसु री। कहै रसखान सो सबै ब्रज वनिता वधि, वधिक कहाय हाय भई कुल हाँसुरी। करिये उपाय बाँस डारियै कटाय, नाहिं, उपजैगौ बाँस नाँहि बजै फेरि बाँसुरी ॥ ३ ॥ शब्दार्थ—घट=घड़ा। मग=मार्ग। दृगनि=आँखों में। हाँसु=हंसी। अर्थ—कृष्ण की बाँसुरी के प्रभाव का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! जब कृष्ण ने बाँसुरी बजाई तो ब्रज की समस्त गोपियाँ किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो गई। जो गोपी जल भरने के लिए गई थी, वह यमुना के किनारे पर ही खड़ी रह गई। जो मार्ग में जा रही थी, उसके आगे पैर चले नहीं। जो घर में थी वह अपना कार्य छोड़कर केवल लम्बे-लम्बे सांस लेने लगी। एक गोपी बाँसुरी की ध्वनि को सुनकर पृथ्वी पर अचेत