रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग ३५१ मे अब मेरी बलाय जाय अर्थात् मै वहाँ बिल्कुल नही जाऊगी क्यो वहाँ व्यर्थ ही मन रूपी चरण मे प्रेम रूपा काँटा गड़ जायेगा अर्थात् कृष्ण से प्रेम हो जायेगा । विशेष—रूपक अलकार । कवित्त सुरतरु लतानि चार फल है ललित कैधो, कामधेनु धारा सम नेह उपजावनी । कैधो चिन्तामनि की माल उर सोभित, बिसाल कठ मे धरै है जोति भलकावनी ॥ प्रभु की कहानी ते गुसाईं की मधुरबानी, मुक्ति सुखदानी रसखानि मनभावनी । खाड की खिजावनी सी कठ की कुढावनी सी, सिता को सतावनी सी सुधा सकुचावनी ॥ ७ ॥ शब्दार्थ—सुरतर=कल्पवृक्ष । चार फल=धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष । ललित=सुन्दर , नेह=स्नेह । सिता=शर्करा, चीनी । अर्थ—इस कवित्त मे राम-कथा के महत्व का वर्णन किया गया है । यह राम कथा कल्पवृक्ष की शाखाओ की भाँति धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार सुन्दर फल देने वाली है या कामधेनु की दुग्ध धारा के समान पवित्र और निर्मल प्रेम को उत्पन्न करने वाली है या हृदय पर चिन्तामणि माला के समान सुशोभित होने वाली है या विशाल कण्ठ मे दिव्य ज्योति के समान भलकने वाली है राम की कथा से गोस्वामी तुलसीदास की वाणी मुक्ति सुख आनन्द देने वाली बनकर मनोहर हो गई । राम-कथा खाँड कन्द शरीर की भाँति मीठी और अमृत के समान अलौकिक आनन्द प्रदान करने वाली है । विशेष—सन्देह, उल्लेख अलकार । अग भभूत लगाय महा सुख है कोउ ऐसौ सो प्रेमहु पागै । नाथ को नाम सुनै विगसै हियो कान्ह को नाम सुनै अनुरागे । जोग लिये हरि प्यारी मिलैतो मै कान फटाये कहा दुख लागै । मोहन के मन मानी यही तो सबै री कहो मिलि गोरख जागै ॥ ८ ॥ शब्दार्थ-भभूत=भस्म । नाथ=गोरखनाथ । विगसैहियौ=हृदय प्रसन्न हो जाता है । अनुरागे=प्रेम पूर्ण हो जाता है । अर्थ—उद्धव के निर्गुण ब्रह्म उपदेश को सुनकर कोई गोपी उद्धव से कहती हैं कि कृष्ण के प्रेम मे निमग्न हुआ क्या कोई ऐसा प्राणी है जो यह कहे कि अगो मे भस्म लगाने से महासुख की प्राप्ति होती है । गोरखनाथ का नाम सुनकर हृदय प्रसन्न हो जाता है परन्तु कृष्ण का नाम सुनने पर