रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५० रसखान-ग्रन्थावली उत्तर—तीन भंगिमाएं बनाकर ग्वाल-समूह के मध्य । प्रश्न—चावलो को चावने वाला कहाँ है ? (शिव वैभव से दूर रहकर कठोर योगी का जीवन बिताते है।) उत्तर--सुदामा के पास । (कृष्ण ने सुदामा के चावल खाये थे ।) प्रश्न--वह विष खाने वाला कहा है ? (शिव ने देवताओ की रक्षा के लिए क्षीर सागर से निकले हुए विष का पान किया था।) उत्तर--पूतना के घर मे । (पूतना राक्षसी अपने स्तनो से विष लगाकर बालक कृष्ण को मारने आई थी।) इस प्रकार जल-पात्र लेकर जाती हुई पार्वती ने अपने तर्को से लक्ष्मी को पराजित कर दिया । सवैया खेलिये फाग निसक ह्वै आज मयक मुखी कहै भाग हमारो । लेहु गुलाल दुग्रौ कर मे पित्र काटिक रंग हिये महं डारो । भावै सु मोहि करो रसखान जु पाँव परौ जनि घूंघट टारो ॥ वीर की सौंह हौं देखिहौं कैसे अबीर तो आँख बचाय के डारो ॥५॥ शब्दार्थ—निसक ह्वै = निडर होकर। मयंकमुखी = चन्द्रमुखी। दुग्रौ = दोनो। भावै = जो अच्छा लगे । पाव परी जनि घूंघट टारो = मैं तुम्हारे पैरों मे पडकर प्रार्थना करती हूँ कि मेरा घूंघट मत खोलो । वीर = भाई । सौह = सौगंध । अर्थ--फाग खेलते समय कोई चन्द्रमुखी गोपी कृष्ण से कहती है कि हे कृष्ण ! हम दोनो को फाग खेलने का अवसर मिला है, यह हमारा सौभाग्य है, अत तुम निडर होकर फाग खेलो। दोनो हाथो मे गुलाल लेकर और पिचकारी मे रंग भरकर मेरे ऊपर डालो । जो अच्छा लगे, उसी प्रकार मेरे साथ फाग खेलो, पर मैं तुमसे पैरो मे पडकर प्रार्थना करती हूँ कि मेरा घूंघट मत खोलो । मैं भाई की सौगन्ध खाकर कहती हूँ कि मेरी आँखो को बचाकर मेरे ऊपर अबीर डालो, वरना आखो मे अबीर पड जाने से मै किस प्रकार तुम्हारे सौन्दर्य को देख सकूँगी ? दोहा नन्द महर कै वगर तन, ऊव मेरे को जाय । नाहक कहुँ गढि जायगो, हित काँटो मन पाय ॥ ६ ॥ शब्दार्थ--वगर = आँगन । मेरे को जाये = मेरी बलाय जाये । = नाहक व्यर्थ मे ही । हित = प्रेम । मन-पाय = मन रूपी चरण मे । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि नन्द मिहिर के आँगन