रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
३२४ रसखान-ग्रन्थावली क्योकि प्रेम को अनुकूल बनाये बिना भगवत्प्रेम की ओर उन्मुख हुए बिना, दृढ़ निश्चयात्मिका बुद्धि उत्पन्न नही होती । दोहा सास्त्रन पढि पडित भए, कै मौलवी कुरान । जु पै प्रेम जान्यौ नही, कहा कियौ रसखान ॥१३॥ शब्दार्थ—सास्त्रन=शास्त्रो को । जु पै=यदि । अर्थ—प्रेम के बिना सारा ज्ञान व्यर्थ है, इस बात का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते है कि व्यक्ति चाहे शास्त्रो को पढकर पडित बन जाये, या कुरान को पढकर मौलवी बन जाये । लेकिन यदि उसने प्रेम-तत्त्व को नही जाना है तो उसका यह ज्ञान पूर्णतया व्यर्थ है । तुलना—'पोथी पढि पढि जग मुआ, पडित भया न कोय । ढाई अच्छर प्रेम का, पढै सो पंडित होय ॥—कबीर दोहा काम क्रोध मद मोह भय, लोभ द्रोह मात्सर्य । इन सबही तैं प्रेम है, परे कहत मुनिवर्य ॥१४॥ शब्दार्थ—काम=काम-भावना । मद=अहकार । द्रोह=शत्रुता । पत्यर्य ईर्ष्या । परे=दूर । पुनिवर्य=मुनि प्रवर । अर्थ—प्रेम सब प्रकार के भावो से श्रेष्ठ है और अशुद्ध भावो से दूर है, इसका प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते है कि काम-भावना, क्रोध, अहकार, ममता, भय, लोभ, शत्रुता और ईर्ष्या इन सभी भावो से प्रेम दूर होता है, अर्थात् प्रेम मे ये भाव नही होते । यह मुनिप्रवरो का मत है । दोहा बिन गुन जोवन रूप धन, बिन स्वारथ हित जानि । सुद्ध कामना ते रहित, प्रेम सकल रसखानि ॥१५॥ शब्दार्थ—गुन=गुण । जोवन=यौवन । बिन स्वारथ हित=स्वार्थ- लाभ से रहित । कामना=इच्छा । कामना ते रहित=निष्काम । रसखान= आनन्द का धाम । अर्थ—प्रेम के महत्त्व का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते है कि जो प्रेम बिना गुण के, यौवन के, रूप के, धन के, स्वार्थ-लाभ से रहित, शुद्ध और निष्काम होता है, वही सच्चा प्रेम है और ऐसा ही प्रेम सुख का धाम होता
व्याख्या भाग ३२५
है, अर्थात् सहज प्रेम ही सच्चा एव सुखकारक प्रेम होता है । दोहा अति सूक्षम कोमल अतिहि, अति पतरो अति दूर । प्रेम कठिन सब ते सदा, नित इकरस भरपूर ॥१६॥ शब्दार्थ—सूछम = सूक्ष्म । पतरो = पतला, क्षीण । अति दूर = अगम्य । इकरस = एक-सा रहने वाला । अर्थ—प्रेम के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते है कि सच्चा प्रेम अत्यन्त सूक्ष्म, कोमल, क्षीण और अगम्य होता है । यह सदैव एक- सा रहने वाला और परिपूर्ण होता है । ऐसा प्रेम सबसे कठिन होता है । दोहा जग मै सब जान्यौ परै, अरु सब कहै कहाइ । मै जगदीश 'रु प्रेम यह, दोऊ अकथ लखाइ ॥१७॥ शब्दार्थ—जान्यो परै = जाना जा सकता है । कहै कहाइ = कहा जा सकता है । अकथ = अकथ्य । अर्थ—प्रेम और ईश्वर की समानता का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते है कि इस ससार की सारी वस्तुएँ जानी जा सकती है, अर्थात् सारी वस्तुएँ बोधगम्य है और सारी वस्तुएँ कही जा सकती है, अर्थात् वर्णनीय हैं, किन्तु ईश्वर और प्रेम ये दोनो अकथ्य एव प्रदर्शनीय है । अर्थात् इन दोनो का न तो वर्णन ही किया जा सकता है और न ये दोनो देखे ही जा सकते हैं । कहने का भाव यह है कि प्रेम ईश्वर की भाँति सूक्ष्म एव दुर्बोध है । दोहा जेहि बिनु जाने कछुहि नहि, जान्यौ जात बिसेष । सोइ प्रेम, जेहि जानिकै, रहि न जात कछु सेष ॥१८॥ शब्दार्थ—सरल है । अर्थ—प्रेम की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते है कि जिस प्रेम को जाने बिना और किसी वस्तु का बोध नही होता और जिसे जानने पर विशेष ज्ञान हो जाता है वही प्रेम है जिसका बोध होने पर और कुछ जानने के लिए शेष नही रह जाता । कहने का भाव यह है कि प्रेम सब ज्ञानो का मूल आधार है ।
३२६ रसखान-ग्रन्थावली दोहा दम्पति-सुख अरु विषम-रस, पूजा निष्ठा ध्यान । इन ते परे वखांनियै, सुद्ध प्रेम रसखान ॥१६॥ शब्दार्थ—दम्पति-सुख = गृहस्थ जीवन का आनन्द । विषय-रस = सांसा- रिक पदार्थों से प्राप्त आनन्द । निष्ठा = धार्मिक विश्वास । ध्यान = ध्यान धारणा आदि । परे = दूर, रहित । अर्थ—शुद्ध प्रेम के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते हैं कि गृहस्थ जीवन के आनन्द से, सांसारिक पदार्थों से प्राप्त आनन्द से, पूजा से धार्मिक विश्वास से, ध्यान धारणा आदि से रहित शुद्ध प्रेम होता है जो आनन्द का सागर है । दोहा मित्र कलत्र सुवन्धु सुत, इनमे सहज सनेह । सुद्ध प्रेम इनमे नही, अकथ कथा सविसेह ॥२०॥ शब्दार्थ—कलत्र = स्त्री। सुवन्धु = हितैषी भाई। सुत = पुत्र । सहज = स्वाभाविक । सविसेह = विशेष रूप से । अर्थ—शुद्ध प्रेम के स्वरूप का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि यद्यपि स्त्री मे हितैषी भाई मे और पुत्र मे स्वाभाविक रूप से प्रेम होता है, परन्तु इस प्रेम को शुद्ध प्रेम नही कहा जा सकता, क्योकि शुद्ध प्रेम तो विशेष रूप से अवर्णनीय कथावाला होता है; अर्थात् उसका वर्णन नही हो सकता । दोहा इक अंगी बिनु कारनहिं, इक रस सदा समान । गनै प्रियहि सर्वस्व जो, सोई प्रेम प्रमान ॥२१॥ शब्दार्थ—इक अंगी = एकांगी । इक रस = एक ही प्रकार का आनन्द । सोई प्रेम प्रमान = वही शुद्ध प्रेम है । अर्थ—शुद्ध प्रेम के स्वरूप का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि जो प्रेम एकांगी हो, अर्थात् प्रत्युत्तर की भावना से परे हो, बिना स्वार्थ आदि कारणो के उत्पन्न हुआ हो और सदैव एक ही प्रकार के आनन्द मे समान रहता हो, अर्थात् जिसमे आनन्द की मात्रा घटती न हो; जिसके होने पर प्रिय को ही सर्वस्व माना जाता हो, वही शुद्ध प्रेम कहलाता है ।
व्याख्या भाग ३२७ दोहा डरै सदा चाहे न कछु, सहै सबै जो होय । रहै एक रस चाहि कै, प्रेम बखानो सोय ॥२२॥ शब्दार्थ—चाहि कै=इच्छा करके । अर्थ—शुद्ध प्रेम के स्वरूप का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि जो प्रेमी सदैव इस भावना को लेकर डरता रहे कि कही उसके प्रेम मे चूक न हो जाये, जो किसी भी प्रकार की स्वार्थ-भावना से रहित हो, जो सब प्रकार की विपत्तियो को सहने के लिए तैयार हो, जो सदैव इच्छा करके एक ही रस मे डूबा हुआ हो, ऐसे ही व्यक्ति को सच्चा प्रेमी कहा जाता है और उसी का प्रेम शुद्ध प्रेम कहलाता है । दोहा प्रेम प्रेम सब कोउ कहै, कठिन प्रेम की फाँस । प्रान तरफि निकरै नही, केवल चलत उसाँस ॥२३॥ शब्दार्थ—फाँस=चुभने वाला काँटा । तरफि=तडप कर । अर्थ—प्रेम वेदना का वर्णन करते हुए रसखान कहते है- कि सभी लोग प्रेम-प्रेम चिल्लाते है; अर्थात् प्रेमी होने का दावा करते है, पर वे यह नहीं जानते कि प्रेम की फाँस बडी दुखदाई होती है । इसमे प्राण तडपते ही रहते है, पर निकलते नही इसके आघात से मनुष्य मृतप्राय हो जाता है और उसके केवल उच्छ्वास चलते रहते है । दोहा प्रेम हरी को रूप है, त्यौ हरि प्रेम स्वरूप । एक होइ द्वै यो लसै, ज्यौ सूरज अरु धूप ॥२४॥ शब्दार्थ—द्वै=दो होकर । लसै=सुशोभित होते है । अर्थ—प्रेम और परमात्मा के एक स्वरूप का वर्णन करते हुए रसखान कहते है कि जिस प्रकार प्रेम परमात्मा का रूप है, उसी प्रकार परमात्मा भी प्रेम का स्वरूप है । एक होकर भी दोनो दो रूपो मे इस प्रकार सुशोभित है जैसे सूरज और उसकी धूप । विशेष—उदाहरण अलकार । दोहा ग्यान ध्यान विद्या मती, मत-विस्वास बिबेक । बिना प्रेम सब धूरि हैं, अगजग एक अनेक ॥२५॥
३२८ रसखान-ग्रन्थावली शब्दार्थ—मती=मति, बुद्धि। विवेक=ज्ञान। अगजग एक अनेक= इस चराचर सृष्टि मे प्रेम एक होकर भी अनेक है। अर्थ—प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि ज्ञान, ध्यान, विद्या, विविध मतो का विश्वास और विवेक सब बिना प्रेम के धूलि के समान निरर्थक है, क्योकि प्रेम ही वह तत्त्व है जो ब्रह्म की भाँति इस संसार मे एक होते हुए ही अनेक रूपो मे दिखाई देता है। विशेष—रूपक अलकार। दोहा प्रेम फाँस मैं फँसि मरै, सोई जिए सदाहि। प्रेम परम जाने विना, मरि कोइ जीवत नाहिं ॥२६॥ शब्दार्थ—फाँश=फन्दा। परम=रहस्य। अर्थ—प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि जो व्यक्ति प्रेम के वन्धन मे बँध कर मर जाता है, कह सदैव जीवित रहता है; अर्थात् प्रेम के वन्धन मे बँधकर व्यक्ति अमर हो जाता है। कोई भी व्यक्ति जो प्रेम के रहस्य को नही जानता, वह मर कर जीवित नही रहता। विशेष—विरोधाभास अलकार। दोहा जग मैं सब तैं अधिक अति, ममता तनहिं लखाय। पै या तरतहूँ तैं अधिक, प्यारो प्रेम कहाय ॥२७॥ शब्दार्थ—सरल है। अर्थ—प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि हम ससार मे सबसे अधिकम मत्व शरीर के प्रति देखा जाता है, परन्तु प्रेम इस शरीर से भी अधिक प्यारा होता है। दोहा जेहि पाएँ बैकुंठ अरु, हरिहूँ की नहिं चाहि। सोह अलौकिक सुद्ध सुभ, सरस सुप्रेम कहाहि ॥२८॥ शब्दार्थ—सरल है। अर्थ—प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि जिस प्रेम को प्राप्त करके वैकुंठ की और भगवान की भी इच्छा नही रहती, उसे ही अलौकिक, शुद्ध, शुभ और सरस प्रेम कहा जाता है।
व्याख्या भाग ३२६ दोहा कोउ याहि फाँसी कहत, कोउ कहत तरवार। नेजा भाला तीर कोउ, कहत अनोखी ढार ॥२६॥ शब्दार्थ-नेजा = बरछी । अर्थ-प्रेम के विविध रूप हैं, इसी बात का वर्णन करते हुए रसखान कहते है कि कोई व्यक्ति तो इस प्रेम को फाँसी बताता है, कोई तलवार, कोई बरछी, भाला और तीर; तथा कोई इसे अनोखी ढाल बताता है। दोहा पै मिठास या मार के, रोम-रोम भरपूर । मरत जियै झुकतौ थिरै, बनै सु चकनाचूर ॥३०॥ शब्दार्थ-झुकतौ = गिरना । थिरै = स्थिर होना, सभलना । अर्थ-प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते है कि प्रेम की चोट गहरी होते हुए भी मधुर होती है। इसकी चोट से मनुष्य का रोम-रोम माधुर्यपूर्ण आनन्द से भरपूर हो जाता है, प्रेम मे मरने वाला व्यक्ति ही जीवित रहता है प्रेम मे गिरता हुआ व्यक्ति ही सम्भलता है। जो व्यक्ति अपना अहंकार पूर्णतया नष्ट करके प्रेम की ओर उन्मुख होता है, उसी का जीवन सुधर जाता है। विशेष-विरोधाभास अलंकार । दोहा पै एतोहूँ रम सुन्यौ, प्रेम अजूबो खेल । जाँबाजी बाजी जहाँ, दिल का दिल से मेल ॥३१॥ शब्दार्थ-अजूबो = अजीब, अद्भुत । जाँबाजी = प्राणो की बाजा । अर्थ-प्रेम की विलक्षणता का वर्णन करते हुए रसखान कहते है कि हमने केवल इतना सुना है कि प्रेम अद्भुत खेल है यह वही खेल है जिसमे प्राणों की बाजी लगाकर दिल से मेल किया जाता है। दोहा सिर काटौ छेदौ हियो, टूक टूक करि देहु । पै याके बदले जिहंसि, वाह वाह ही लेहु ॥३२॥ शब्दार्थ-सरल है।
३३० रसखान-ग्रन्थावली
अर्थ—प्रेम की कठिनता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि जब व्यक्ति अपने सिर को काट लेता है और हृदय को छेद कर टूक-टूक कर लेता है, तब उसके बदले मे उसे प्रशसा मिलती है, अर्थात् वही व्यक्ति प्रेमी होकर प्रशसा का पात्र बनता है । दोहा अकथ कहानी प्रेम की, जानत लैली खूब । दो तनहूँ जहँ एक ये, मन मिलाइ महबूब ॥३३॥ शब्दार्थ—अकथ=अकथ्य । लैली=लैला, मजनूं की प्रेमिका । महबूब= प्रेमी । अर्थ—प्रेम की कहानी अकथनीय है जिसे मजनू की प्रेमिका लैला अच्छी तरह जानती है । प्रेम वह वरदान है जो दो प्रेमियो के तन को तथा मन को मिलाकर एक कर देता है । दोहा दो मन इक होते सुन्यौ, पै वह प्रेम न आहि होइ जबै द्वै तनहुँ इक, सोई प्रेम कहाहि ॥३४॥ शब्दार्थ—आहि=है । अर्थ—प्रेम के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते है कि यद्यपि मैंने प्रेम मे दो मनो को एक होते हुए सुना है, लेकिन यह वास्तविक प्रेम नही है । जब दो शरीर एक हो जाते हैं, तो उसे ही प्रेम कहते हैं । 'प्रेमानन्द प्रकारेण द्वैत विस्मरणं गतम् ।' तुलना—१. 'आसिक-मासुक ह्वै गया, इश्क कहावै सोय । दादू उस मासूक का, अल्ला आसिक होय ॥'—दादूदयाल दोहा याही तें सब मुक्ति ते, लही बडाई प्रेम । प्रेम भए नसि जाहि सब, बँधे जगत के नेम ॥३५॥ शब्दार्थ—याही ते=इसी कारण से । लही=प्राप्त की । नसि जाहि= नष्ट हो जाते हैं । नेम=नियम । अर्थ—प्रेम मे दो शरीरो को एक करने की शक्ति होती है, इसी कारण से प्रेम ने मुक्ति से भी अधिक प्रशसा प्राप्त की है, अर्थात् प्रेम का स्थान मुक्ति
व्याख्या भाग ३३१ से भी ऊँचा है। प्रेम के होने पर संसार के सारे बँधे हुए नियम नष्ट हो जाते हैं, अर्थात् प्रेमी संसार के किसी भी नियम को नही मानता। दोहा हरि के सब आधीन पै, हरी प्रेम-अधीन। याही ते हरि आपुही, याहि बडप्पन दीन ॥३६॥ शब्दार्थ—सरल है। अर्थ—प्रेम भगवान से भी बडा है, इसी बात का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते है कि ससार के सब प्राणी भगवान के वश मे हैं, पर भगवान प्रेम के वश मे होते है। इसीलिए स्वय भगवान् से अपने-से अधिक प्रेम को महत्ता प्रदान की है। तुलना—१. 'हरि ब्रज जन आधीन है, ब्रजजन॒ हरि आधीन।'—नागरीदास २. 'स्वामी ते सेवक बडो, जो निज धर्म सुजान । राम बाँधि उतरे उदधि, लाँघि गए हनुमान ॥'—तुलसी दोहा वेद मूल सब धर्म यह, कहैं सबै स्रुतिसार। परम धर्म है ताहु ते, प्रेम एक अनिवार ॥३७॥ शब्दार्थ—स्रुतिसार=वेदो का तत्व । अनिवार=अनिवार्य । अर्थ—प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते है कि वेद सब धर्मो का मूल है, परन्तु प्रेम को श्रुतियो का तत्व कहा जाता हैं। इसलिए प्रेम परम धर्म और अनिवार्य तत्त्व है। जदपि जसोदानन्दन अरु ग्वाल-वाल सब धन्य । पै या जग मैं प्रेम कौ गोपी भई अनन्य ॥३८॥ शब्दार्थ—जसोदानन्दन = कृष्ण । अनन्य=अद्वितीय । अर्थ—प्रेम की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते है कि यद्यपि कृष्ण का प्रेम पाने से कृष्ण, ग्वाल-बाल आदि सब धन्य है, किन्तु इस ससार मे अत्यधिक प्रेमिका होने के कारण गोपियाँ अद्वितीय बन गई है; अर्थात् उनके समान कोई नही है। तुलना—'कविरा कविरा क्या कहै, जा जमुना के तीर । इक इक गोपी प्रेम पै, बहिगे कोटि कबीर ॥'—कबीर
३३२ रसखान-ग्रन्थावली दोहा वा रस की कछु माधुरी, ऊधो लही सराहि । पावै बहुरि मिठास अरु, अब दूजो को आहि ॥३६॥ शब्दार्थ—वा रस की=प्रेमानन्द की । बहुरि=फिर । अर्थ—प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते है कि प्रेमानन्द का कुछ माधुर्य उद्धव ने सराह कर ग्रहण किया था। जो माधुर्य उद्धव को प्राप्त हो गया है, अब उस माधुर्य को फिर से कौन प्राप्त कर सकता है ? दोहा स्रवन कीरतन दरसनंहि, जो उपजत सोइ प्रेम । सुद्धासुद्ध विभेद तैं, द्वैविध ताके नेम ॥४०॥ शब्दार्थ—स्रवन=श्रवण, सुनना । सुद्धासुद्ध=शुद्ध और अशुद्ध । द्वैविध =दो प्रकार के । नेम=नियम । अर्थ—प्रेम के भेदो का निरुपण करते हुए रसखान कहते हैं कि जो प्रेम श्रवण, कीर्तन और दर्शन से उत्पन्न होता है, वही शुद्ध और अशुद्ध, निष्काम और सकाम, ये दो प्रकार के प्रेम होते हैं। दोहा स्वारथमूल अशुद्ध त्यौ, सुद्ध स्वभावऽनुकूल । नारदादि प्रस्तार करि, कियौ जाहि को तूल ॥४१॥ शब्दार्थ—स्वारथमूल=स्वार्थ-भावना से युक्त । स्वभावऽनुकूल=सहज भाव से । प्रस्तार करि=विस्तार से । तूल=विस्तार । अर्थ—प्रेम के दो भेद होते हैं—शुद्ध और अशुद्ध । शुद्ध और अशुद्ध प्रेम के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते हैं कि जो प्रेम स्वार्थ-भावना से युक्त होता है, उसे अशुद्ध प्रेम कहते है और जो सहज भाव से होता है, उसे शुद्ध प्रेम कहते हैं। नारद आदि महर्षियों ने इन दोनों प्रकार के प्रेमो का वर्णन विस्तार से किया है। दोहा रसमय स्वाभाविक बिना, स्वारथ अचल महान । सदा एकरस सुद्ध सोइ, प्रेम अहै रसखान ॥४२॥ शब्दार्थ—रसमय=आनन्द से पूर्ण । स्वाभाविक=सहज । एकरस= निरन्तर समान रहने वाला ।
व्याख्या भाग ३३३ अर्थ—शुद्ध प्रेम के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते हैं कि- जो प्रेम आनन्द से पूर्ण, सहज, निष्काम, अचल, महान् और निरन्तर समान- रहने वाला होता है, जो कभी घटता नहीं है, वह शुद्ध प्रेम कहलाता है। दोहा जाते उपजत प्रेम सोह, बीज कहावत प्रेम। जामैं उपजत प्रेम सोइ, क्षेत्र कहावत प्रेम ॥४३॥ शब्दार्थ—सरल है। अर्थ—प्रेम के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते हैं कि जिस कारण से प्रेम उत्पन्न होता है, उसे प्रेम का बीज कहते हैं और जो प्रेम का- आश्रय होता है, उसे प्रेम का क्षेत्र कहते हैं। दोहा जाते पनपत बढ़त अरु, फूलत फलत महान। सो सब प्रेमहि प्रेम यह, कहत रसिक रसखान ॥४४॥ शब्दार्थ—सरल है। अर्थ—प्रेम के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते हैं कि- जिससे प्रेम उत्पन्न होता है, बढ़ता है, फूलता तथा बढ़ता है और महान् बनता है, यह सब प्रेम ही होता है। दोहा वही बीज अंकुर वही, सेक वही आधार। डाल पात फल फूल सब, वही प्रेम सुखसार ॥४५॥ शब्दार्थ—सेक = सिंचन । अर्थ—प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि प्रेम ही- बीज है, वही अंकुर है, वही सिंचन है, वही आधार है, वही डाल, पात, फल, फूल और सुख का सार है। दोहा जो जाते जामैं बहुरि, जा हित कहियत बेष। सो सब प्रेमहि प्रेम है, जग रसखानि असेष ॥४६॥ शब्दार्थ—बहुरि=फिर। बेष=श्रेष्ठ। असेष=पूर्णरूप से। अर्थ—प्रेम की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते हैं कि जो, जिससे और फिर जिसमे जगत् का सौन्दर्य, श्रेयता, महत्ता, उत्कृष्टता आदि- गुण विद्यमान हैं, वे सब इस चराचर सृष्टि में प्रेम-रूप से भासित हैं।
३३४ रसखान-ग्रन्थावली दोहा कारज कारन रूप सब, प्रेम एक रसखान । कर्ता कर्म क्रिया करन, गनिए प्रेम समान ॥४८॥ शब्दार्थ—कारज-कार्य। कारन-कारण, साधन। अर्थ—प्रेम की महत्ता एवं व्यापकता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि प्रेम ही जगत् का कारण है; अर्थात् जगत् की उत्पत्ति प्रेम से ही हुई है और जगत् की रचना रूप कार्य भी प्रेममय है। प्रेम ही कर्ता, कर्म, क्रिया और भगवान् का रूप है। दोहा देखि गदर हित-साहिबी, दिल्ली नगर मसान । छिनहिं बादसा-बंस की, ठसक छोड़ि रसखान ॥४९॥ शब्दार्थ—हित-साहिबी = प्रभुत्व के लिए। ठसक = झूठा गर्व। अर्थ—अपने जीवन की एक घटना का उल्लेख करते हुए रसखान कहते हैं कि दिल्ली में प्रभुत्व के लिए विप्लव देखकर तथा दिल्ली को उजड़ा हुआ देखकर, पठान बादशाहों के वंश का झूठा गर्व समाप्त होते देखकर मैंने दिल्ली छोड़ दी। दोहा प्रेम-निकेतन श्रीबनहिं, आइ गोबर्द्धन-धाम । लह्यो सरन चित चाहि कै, जुगल स्वरूप ललाम ॥५०॥ शब्दार्थ—प्रेम-निकेतन = प्रेम धाम। श्रीबनहिं = वृन्दावन में। गोबर्द्धन धाम = ब्रज का एक प्रसिद्ध स्थान। चित चाहि कै = ध्यानपूर्वक। जुगल- स्वरूप = राधा और कृष्ण का रूप। ललाम = सुन्दर। अर्थ—अपने वृन्दावन-निवास की घटना की ओर संकेत करते हुए रसखान कहते हैं कि दिल्ली छोड़कर मैं प्रेम-धाम वृन्दावन आ गया और गोवर्धन नामक स्थान पर बस गया और राधा-कृष्ण के सुन्दर रूप की श्रद्धापूर्वक शरण ग्रहण की; अर्थात् राधा-कृष्ण की भक्ति में तल्लीन हो गया। दोहा बोरि मानिनी नै दियो, बोरि मोहिनी-मान । प्रेम-रंग की गहिरता कहि, गुन निरखे रसखान ॥५१॥
ऽदशाल्या भाग ३३५ शब्दार्थ—प्रेमदेव = कृष्ण । छविहि = शोभा को । अर्थ—कृष्ण-भक्ति की ओर अपना प्रेम प्रदर्शित करते हुए रसखान कहते है कि मान करने वाली नारी का हृदय तोडकर, अर्थात् उसके प्रेम के बंधनो को छोडकर और मन को मोहित करने वाली स्त्रियो के गर्व को चूर्ण करके तथा कृष्ण की शोभा को देखकर मुसलमान-धर्मावलम्बी रसखान कृष्ण-भक्ति मे तन्मय हो गये । दोहा बिधु सागर रस इन्दु सुभ, बरस सरस रसखान । प्रेम वाटिका रचि रुचिर, चिर हिय हरषि बखान ॥५१॥ शब्दार्थ—बिधु सागर रस इन्दु = सवत् १६७१ । रुचिर = सुन्दर । अर्थ—रसखान कहते है कि मैंने उल्लसित होकर इस सरस और सुन्दर प्रेम वाटिका की रचना शुभ वर्ष मे संवत् १६७१ वि० मे की । दोहा अरपी श्री हरि चरन जुग पुहुप पराग निहार । बिचरहिं या मैं रसिकबर, मधुकर निकर अपार ॥५२॥ शब्दार्थ—अरपी = अर्पित की । पुहुप पराग = कमल-केसर । मधुकर- निकर = भौरो का समूह । अर्थ—रसखान कहते है कि मैंने यह प्रेम-वाटिका श्रीकृष्ण के दोनो चरणो के कमल-केसर को देखकर उनको अर्पित की । आशा है कि अपार भौरो के समूह रूपी रसिकवर इसमे विचरण करेगे; अर्थात् इससे आनन्द प्राप्त करेगे । दोहा (शेष पूरण) राधा-माधव सखिन संग, बिरहत कुंज-कुटीर । रसिकराज रसखानि तहँ, कूजत कोइल कीर ॥५३॥ शब्दार्थ—माधव = कृष्ण । कोइल = कोयल । कीर = तोता । अर्थ—रसखान् कहते है कि राधा और कृष्ण अन्य सखियो के साथ कुंज- कुटीरो मे विचरण करे और वहाँ पर रसिकराज रसखान कोयल तथा तोते के रूप मे कूजता रहे ।
३३६ रसखान-ग्रन्थावली दानलीला सवैया आवत हो रस के चसके तुम जानत हौ रस होत कहा हो । नैसक वै रस भीजन दैहौ दिना दस के अलवेले लला हो । अत वही दिन आवेगे भूमि गुवालिन ही के जु संग सखा हो । ल्योगे कहा इन बातन तै घर जाव लला अब ही लरका हो ॥१०॥ शब्दार्थ—चसके=लोभ से । नैसक=थोड़ा-सा । लरका=अबोध । अर्थ—कोई गोपी कृष्ण की भर्त्सना करती हुई कहती है कि हे कृष्ण ! तुम मेरे पास रस के लोभ से आये हो, लेकिन तुम यह नही जानते कि रस क्या होता है ? अभी तो तुम दस दिन के अलवेले लड़के हो; अर्थात् अल्पायु के हो, अतः स्वयं को थोड़ा-सा रस मे तो भीगने दो; अर्थात् वह अवस्था तो आने दो, जब रसास्वादन का बोध हो पाता है । अंत मे वे ही दिन आ जायेंगे जब तुम ग्वालिनो के साथ घूमकर रस का आनन्द लोगे । अतः तुम अभी से इन बातों से क्या लोगे । तुम अभी अबोध हो, इसलिए अपने घर चले जाओ । सवैया आई हो आज नई ब्रज मे कछु नैन नचाइ कै रार मचैहौ । जानति हौ हमही छलि कै दधि बेचन जाव सो जान न पैहौ । लैहौ चुकाह सबै तुम सो रसखानि भले मन मैं पछतैहौ । जो तुम होहु बड़े घर की अइलात कहा हौ जगात न दैहौ ॥२॥ शब्दार्थ—रार=झगड़ा । अइलात==गर्व करना । जगात=कर, टैक्स । अर्थ—गोपी की बाते सुनकर कृष्ण कहते हैं कि तुम अभी ब्रज मे नई- नई आई हो, इसीलिए आँखें नचाकर झगड़ा कर रही हो, अर्थात् तुम्हारा यह झगड़ा केवल दिखावे के लिए है, वास्तविक नहीं है । तुम चाहती हो कि हमे धोखा देकर तुम दही बेचने के लिए निकल जाओ, पर हम तुम्हे इस प्रकार नहीं जानें देगे । रसखान कहते हैं कि चाहे तुम अपने मन मे जितना पछतावा करो, पर हम तुमसे सब कर वसूल कर लेंगे । यदि तुम किसी बड़े घर की हो तो इसमे गर्व करने की भी कोई बात नहीं है, क्योकि तुम्हारा कर न देने का आग्रह व्यर्थ है; अर्थात् चाहे तुम जितने बड़े घर की हो, हम बिना कर लिए तुम्हे नही छोड़ें ।
व्याख्या भाग ३३७ सवैया सुनिकै यह वात हिये गुनि कै तब बोलि उठि वृषभान-लली । कहौ कान्ह अजान भए वन मे कहूँ माँगत दान कि छेकि गली ॥ मग आइ कै जाइ रिसाइ कहा तुम एकऊ वात कही न भली । हम है वृषभानपुरा की लली अव गोरस वेचन जात चली ॥३॥ शब्दार्थ—गुनि कै = सोचकर । वृषभान-लली = राधा । गोरस = दही । अर्थ—कृष्ण की बाते सुनकर और उन्हे अपने हृदय मे सोचकर राधा कहती हे कि हे कृष्ण ! आज तुम अजान बन गये हो, जो बन मे हमारा मार्ग रोकते हो । तुम हमारा मार्ग ही रोकना चाहते हो, अथवा कुछ माँगना चाहते हो । मार्ग मे आकर और अपनी इच्छा पूरी न हो सकने के कारण तुम क्रोधित होकर क्यो जाते हो ? तुमने तो एक भी वात ठीक नही कही । हम राजा वृषभानु की पुत्री है और अब दही बेचने के लिए जा रही है । तुम्हारे रोके से हम नही रुक सकती । सवैया एरी कहा वृषभानुपुरा की तौ दान दिये बिन जान न पैहौ । जौ दधि-माखन देव जू चाखन भूमत लाखन या मग ऐहौ । नाहिं तौ जो रस सो रस लैहौ जु गोरस बेचन फेरि न जैहौ । नाहक नारि तू रारि बढावति गारि दिये फिरि आपहि दैहौ ॥४॥ शब्दार्थ—लाखन = लाखो बार । नाटक = व्यर्थ मे । आपहि दैहौ = आप भी खायोगी । अर्थ—राधा की चुनौती सुनकर कृष्ण कहते है कि तुम मुझे वृषभानु की पुत्री होने का क्या भय दिखाती हो ? मै विना कर दिये तुम्हे यहाँ से जाने न दूँगा । यदि तुम मुझे खाने के लिए दही और मक्खन दे दोगी, तो इस मार्ग से लाखो बार निशक होकर निकल जाओ, कोई तुम्हे कुछ न कहेगा । यदि तुम अपनी मरजी से मुझे गोरस नही दोगी तो जो तुम्हारे पास गोरस है, वह तो मै छीन ही लूँगा, और फिर तुम्हे इस मार्ग से कभी भी जाने नही दूँगा । हे नारी ! तुम व्यर्थ मे ही झगड़ा बढाती हो । यदि तुम मुझको गाली दोगी तो उनके बदले मे स्वयं भी गाली खाओगी ।
३३८ रसखान-ग्रन्थावली कवित्त गारी के देवैया वनवारी तुम कहौ कौन, हम तौं वृषभान की कुमारी सब जानो है । जोर तौ करौगे जाड जासो हरि पार पाइ, भुरही ते आज मो सो कैसो हठ ठानो है । बूझि देखौ मन माहि अरुझत मग जात, बूझिहौ निदान कान्ह जोन कहो मानो है । मेरे जान कोऊ मीरखान आवै दही छीनै, तू तौ है अहीर मोहि नाहिं पहिचानो है ॥५॥ शब्दार्थ-गारी = गाली । जोर = बल-प्रयोग । पार पाइ = पार पाना, कार्य की सिद्धि होना । भुरही ते = प्रातःकाल से ही । अरुझत = झगड़ना । मीरखान = राज्य ; उच्च अधिकारी । अर्थ-कृष्ण की बाते सुनकर राधा कहती है कि हे कृष्ण ! तुम गाली देने वाले कौन होते हो, अर्थात् तुम्हे गाली देने का क्या अधिकार है । सब लोग इस बात को जानते हैं कि हम राजा वृषभानु की पुत्री हैं और इसलिए हमे गाली देना आसान नही है । हे कृष्ण ! यदि बल-प्रयोग करना ही है तो उससे करो जिससे तुम्हारी कार्य-सिद्धि हो जाये । आज न जाने तुमने क्यो प्रातः काल से ही मेरे साथ झगडा शुरू कर दिया है । तुम अपने मन में सोचकर देख लो कि रास्ते मे किसी से भी झगडा करना उचित नही है । यदि तुम्हे मेरा विश्वास न हो तो जिसका तुम्हे विश्वास है, उसी से बात को पूछकर देख लो । मै तो यह जानती हूँ कि राज्य का कोई उच्च अधिकारी ही दही छीनने के लिए आ सकता है । पर तुम तो केवल अहीर हो; अर्थात् साधारण-सी जाति के पुत्र हो और तुम मुझे को नही पहिचान रहे हो । विशेष-व्यंग्यात्मकता के द्वारा प्रभावोत्कर्ष । कवित्त तोहूँ पहचानौं वृषभान हूँ को जानौ नेकु, काहू की न शका मानौं हौं अहीर ऐसो हौ । मीरन को मारि मान तोरिहौ गुमान लैहौ, आज तोसो दान लैहौ देखिये जु जैसो हो ।
व्याख्या भाग ३३६ फोरिहो मटूकी माट लै दही करौंगो लूट, जैहो कोने सु तौ घाट वाट रोके बैसौ हौं । कहा कहौं राधे तोहि अजहूँ न चीन्है मोहिं, मेरी ओर देखि नेकु दानी कान्ह कैसो हौं ॥ ६ ॥ शब्दार्थ – नेकु = तनिक भी। संका = डर। मीरन को = सरदारो को। गुमान = गर्व। मटूकी = मटकी, छोटा घड़ा। माट = घड़ा। बैसो हौं = बैठ गया हूँ। चीन्है = पहिचानना। दानी = कर (टैक्स) लेने वाला। अर्थ – राधा की बातें सुनकर कृष्ण कहते हैं कि हे राधा ! मै तुम्हे भी जानता हूँ और तेरे पिता वृषभानु को भी जानता हूँ, लेकिन मै ऐसा अहीर हूँ कि किसी का भी डर नही मानता। राज्य के सरदारों को मार कर जिनका तुम घमण्ड करती हो, तुम्हारा गर्व चूर्ण कर दूँगा। आज मैं तुमसे दान लेकर ही रहूँगा और फिर तुम्हे मेरी शक्ति का पता चलेगा। मैं तुम्हारे छोटे और बडे घडो को फोड़कर तुम्हारी दही को लूट लूँगा और फिर तुम चाहे जिससे शिकायत करो, मै इसी रास्ते पर बैठा हुआ हूँ, डर कर कही भागूँगा नही। हे राधा ! मै तुमसे क्या कहूँ ? तुम आज भी मुझे नही पहिचान रही हो। मेरी ओर तो देखो, तुम्हे पता चलेगा कि तुमसे कर लेने वाला कृष्ण कैसा है। कवित्त जोहौं मैं तिहारी ओर नन्दगाव के किसोर, माखन के चोर तुम गोकुल के बासी हौ । जसुदा तिहारी माड ऊखल सो बाँधो जाइ, दानी पै कहाइ आइ भए कामरासी हौ । कंस सो कहौगी जाइ माँगिहौं तुमै घराइ, रहौगे कहाँ छिपाइ जो बडे मवासी हौ । गोरस को दान हम आजहु न सुने कान, काहे लाल हम सो करत रोज रासी हौ ॥ ७ ॥ शब्दार्थ – जोहे = देखती हूँ। कामरासी = काम भावना से युक्त। तुमै घराइ = तुमको बन्दी बनाने के लिए। मवासी = सुरक्षित दुर्ग। अर्थ – कृष्ण की बाते सुनकर राधा कहती है कि हे कृष्ण ! मैं तुम्हारी ओर देखती हूँ और तुम्हे पहिचानती भी हूँ। तुम नन्द गाँव के युवक हो, मक्खन के चोर हो और गोकुल के निवासी हो। यशोदा, जिसने तुम्हे ऊखल
३४० रसखान-ग्रन्थावली से बाँध दिया था, तुम्हारी मां है । आज तुम यहाँ आकर कर लेने वाले बन गये हो और काम भावना से युक्त हो गये हो । मैं कंस से तुम्हे वन्दी बनाने के लिए विनती करुँगी और फिर तुम सुरक्षित दुर्गों मे भी नही छिप सकोगे, क्योकि कंस तुम्हे वन्दी बनाकर ही रहेगा । हमने कभी यह नही सुना कि दही पर भी कर लगता है, अतः हमारे साथ प्रतिदिन परिहास करना ठीक नही है । कवित्त दान पै न कान सुने लैहो सो गुमान भंजि, हासी पर हासी परहासी आज करौंगो । जेती तुम ग्वालिन तितेक सब रोकि राखौं, जमुना की ओटि पै जु सबै काम सरौगो । जाको तू कहति कंस ताहि को करौ विधंस, हौं तौ जदुवंस वीर काहू सो न डरौगो । भूपन उत्तारि चीर फारिचीर डारि दैहौं, नन्द की दुहाई खात टेक सों न टरौगो ॥८॥ शब्दार्थ—भंजि = चूर्ण करना । सरौंगो = पूर्ण करूँगा । विधंस = विध्वंस । टेक सो = प्रण से । अर्थ—राधा की बाते सुनकर कृष्ण कहते है कि यदि तुम दान देने की बात को नही सुनोगी तो मै तुम्हारा गर्व चूर्ण कर दूँगा और तुम्हारी विविध प्रकार से हाँसी करूँगा । जितनी तुम ग्वालिन हो, उन सबको मै रोक लूँगा और यमुना की ओट मे अपने सब कार्यों को पूर्ण करूँगा । जिस कंस की तुम मुझे धमकी दिखलाती हो, उसका नाश कर दूँगा । मैं यदुवंश का वीर हूँ, इसीलिए किसी से भी नहीं डरूँगा । तुम्हारे भूषणो को उतार कर तुम्हारे चीर के टुकडे टुकडे कर डालूँगा । मै नन्द बाबा की सौगन्ध खाकर कहता हूँ कि अपने प्रण से तनिक भी नही हटूंगा, अर्थात् प्रण पूरा करके रहूँगा । कवित्त नन्द की न दासी हम जातिहू मै नाही कम, एक गाँव बसौ स्याम भोर भए वादी हो । जमुना के तीर तुम चीर हू चुराइ रहौ, ताहू की न लाज आई ओर कि फसादी हो ।
व्याख्या भाग ३४१ रोकत हौ टोकत हौ वाट माहि साट खाह, माट फोरि चाटौ दही यही गुन आदी हौ । जौ कहूँ बैठारिहौ न पारिहौ रुआब माहि, नोन की न गोन ली है आदी हूँ न लादी हो ॥६॥ शब्दार्थ—भोर भए=भोले होकर । बादी=झगडालू । ओर के=भारी । फसादी=झगडा करने वाले । साट खाह=दूसरो का धन लूटना । आदी= स्वभाव वाले । रुआब=रौव । नोन=नमक । गोन=माल लादने की बोरी । आदी=आद्रक, अदरक । अर्थ—कृष्ण की बाते सुनकर राधा कहती है कि हे कृष्ण, न तो हम नन्द की दासी है, जिस प्रकार तुम हो और न तुमसे जाति मे ही कम है । हम सब एक ही गाँव के रहने वाले है, लेकिन तुम भोले बनकर भी झगडालू हो, अर्थात् केवल देखने मे ही भोले दिखाई देते हो, अन्यथा तुम तो स्वभाव से झगडालू हो । तुमने यमुना के किनारे पर जाकर स्नान करती हुई गोपियो के वस्त्र चुरा लिये थे । इस अधम कार्य को करके भी तुम्हे लज्जा नहीं आई । तुम तो भारी झगडा करने वाले हो । दूसरो का धन लूटने के लिए तुम उनका रास्ता रोकते हो, उन्हे टोकते हो । तुम्हारा अब यह स्वभाव बन गया है कि तुम घडा फोडकर दही खाने वाले बन गये हो । जो तुम्हे कही बैठाया जाये तो तुम रौव भी नही दिखा सकते, अर्थात् तुम्हारा व्यक्तित्व भी प्रभावशाली नही है । फिर यह भी समझ लो कि हम गोन मे नमक और अदरक भरकर लादने के आदी नही है, अर्थात् हम कोई साधारण व्यापारी नही हैं, यदि तुम हमें छेडोगे तो तुम्हे इसका बहुत मूल्य देना पडेगा । कवित्त मेरो को करै नियाव हौ तो तीनि लोक राव, हमै घेरी माँटी चाव दाव भलो पायौ है । बृंदावन कुज माँह कदम की छाँह चलौ, अंक भरि भेटि लैहौ जैसो मन भायौ है । हीरा मनि मानिक की काँच और पोतिन की । मोतिन की गात की जगाती हौ लगायौ है । गोरस तौ ढेर ढेर खाहु पीयौ बेर बेर, देखहु सलोनो रूप दानी कान्ह आयौ है ॥१०॥
३४२ रसखान-ग्रन्थावली शब्दार्थ—नियाव = न्याय। राव = राजा। अंक भरि = बाहुपाश मे बाँध कर। मोतिन की = माला के मनकों की। जगात = कर। अर्थ—राधा की बाते सुनकर कृष्ण कहते है कि मेरा न्याय कौन कर सकता है, क्योकि मै तीनो लोको का राजा हूँ अर्थात् मैं तो स्वय ही सबसे बड़ा हूँ। तुम इसी कारण उल्लसित होकर यही दाव देखकर फेर लेती हो। तुम वृन्दावन के कुंजो मे उत्पन्न कदम्ब के रथो की छाया मे चलो और जैसा मैं चाहता हूँ, वहाँ तुम्हे बाहुपाश मे लूँगा। मैने हीरा, मणि, मानिक, बाँध, पनके और मोती जैसे तुम्हारे शरीर पर कर लगाना है। गोरस तो मैने अनेक बार अत्यधिक मात्रा मे खाया-पिया है, अब तुम यह समझ लो कि मै तुम्हारे सुन्दर शरीर से कर वसूल करने आया हूँ। सवैया नौ लख गाय सुनी हम नन्द के तापर दूध दही न अघाने। माँगत भीख फिरौ वन ही वन झूठी ही बातन के पन पाने॥ और की नारिन के मुख जोवत लाज गहौ कछु होहु सयाने। जाहु भले जु चले घर जाहु चले बस जाउ वृन्दावन जाने॥१९१॥ शब्दार्थ—नौ लख = नौ लाख। अघाने = तृप्त हुए। जोवत = देखना। होहु सयाने = होश मे आकर। जाने = जानती है। अर्थ—कृष्ण की बाते सुनकर राधा कहती है कि हे कृष्ण! मैने सुना हैं कि नद के नौ लाख गाये है, फिर भी तुम उनको दूध दही खाकर तृप्त नही हुए। तुम वन-बन मे झूठी बाते बनाकर भीख माँगते फिरते हो। तुम दूसरों की स्त्रियो के मुह देखते फिरते हो। तुम्हारा यह कार्य नही है, अतः होश मे आकर कुछ शरम करो। अच्छा यही है कि तुम वृन्दावन अपने घर चले जाओ, क्योकि हम तुम्हे भली प्रकार जानते है।
स्फुट पद तू एसी चतुराई ठानैं, काहे को निकसत या गैल । गैल कहा तेरे बाबा की, हम निकसी का पहिल पहैल । यह पैडो सबहिन चलिबे को, काहे को तू रोकत छैल । रसखान के प्रभु सूधो चलि जा, देहुँ उरहनौ नद महैल ॥१॥ शब्दार्थ—गैल=रास्ता । पहिल पहैल=प्रथम रास्ता । पैडो रास्ता । उरहनौ=उपालम्भ, शिकायत । नंद महैल=नदमहिर । अर्थ—मार्ग मे जाते हुए किसी गोपी को कृष्ण ने छेड दिया । वह कृष्ण को बुरा-भला कहने लगी । इस पर कृष्ण ने कहा कि यदि अपने मन मे इतनी होशियार बनती है तो इस रास्ते से निकलती ही क्यो हैं ? इस पर गोपी कहती है कि यह रास्ता न तो तेरे बाबा का है और न हम प्रथम बार ही इससे जा रही हैं, पहले भी इस रास्ते से निकल चुकी है । रास्ता तो सभी के चलने के लिए है अत हे छैला ! तुम रास्ता क्यो रोकते हो ? हैं रसखान के प्रभु ! हमे छोडकर या तो सीधे-सीधे यहाँ से चले जाओ, वरना तुम्हारी शिकायत नन्दमहिर से कर देगी । गारी खायगौ अरे गँवार ? ऐसी कौन सिखाई तोहै, पकरत आप पराई नार ? जा जा गोरस ले पिबैया, कौन है तू मग रोकनहार ? एती बरजोरी ना कीजै, मोहन सीख दई सत बार । खीजि मटुकिया झटकि सुपटकी, गोरस बहि-बहि चल्यौ पनार ? रसखान के प्रभु आज जान दै, कल आऊगी यहै करार ॥२॥ शब्दार्थ—गँवार=धृष्ट । गोरस=दही । वरजोरी=छीना-झपटी । सीख=शिक्षा । सतबार=सैकड़ो बार । खीजि=क्रोधित होकर । पनार=नाली । अर्थ—कोई गोपी दही बेचने के लिए जा रही थी । रास्ते मे कृष्ण मिल गये और उससे छेड़खानी करने लगे । इस पर गोपी ने कहा कि हे ३४३