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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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व्याख्या भाग ३१३ कर दिया था । उससे युद्ध करने के लिए कृष्ण कछनी बाँध कर आ गये । रसखान कहते है कि उन्होने अपने मन मे विचार कर के उस हाथी का दाँत 'लिया और उन्होने उसे तमाल की डाली की भाँति तोड दिया । कृष्ण का यह कार्य ऐसा प्रतीत हुआ मानो उन्होने कलकरूपी तमाल वृक्ष जैसे तुच्छ स्थान पर लगी कीर्तिरूपी शाखा को तोड दिया हो । विशेष—उत्प्रेक्षा अलंकार । पाठान्तर—'इस सवैया की तृतीय पंक्ति का यह रूप भी मिलता है 'रद्द दुरद्द को ऐंच लियौ रसखान यहै, मन आइ विचार सी ।' उद्धव-उपदेश सवैया जोग सिखावत आवत है वह कौन कहावत को है कहाँ को । जानति है वर नागर है पर नेकहु भेद लख्यौ नहिं ह्वाँ को ॥ जानति ना हम और कछू मुख देखि जियैं नित नन्दलला को । जात नही रसखानि हमै तजि राखनहारी है मोरपखा को ॥२४८॥ शब्दार्थ—वर = श्रेष्ठ । नन्दलला = कृष्ण । अर्थ—निर्गुण ब्रह्म का उपदेश देने के लिए आए हुए उद्धव को देख कर गोपियाँ परस्पर कहती है कि योग की शिक्षा देता हुआ जो व्यक्ति आ रहा है, -यह कौन है ? उसका क्या नाम है ? कहाँ वह रहता है ? यद्यपि हम जानती है कि वह कोई श्रेष्ठ आदमी है, तथापि इसका हमको तनिक भी भेद (परिचय) ज्ञात नही है । यह चाहे कितना ही योगोपदेश करे, पर हम तो इसके अतिरिक्त और कुछ नही जानती कि हम नित्य कृष्ण के दर्शन करके ही जीवित रहती हैं, रसखान कहते हे कि कृष्ण हमसे नही त्यागे जाते, क्योकि वे मोर मुकुटधारी कृष्ण ही हमारे रक्षक है । सवैया अंजन मंजन त्यागौ अली अँग धारि भभूत करौ अनुरागै । आपुन भाग करयौ सजनी इन बावरे ऊधो जू को कहाँ लागै ॥ चाहै सो और सबै करियै जु कहै रसखान सयानप आगै । जो मन मोहन ऐसी बसी तो सबै री कहौ मुख गोरस जागै ॥२४६॥ शब्दार्थ—अंजन मंजन = श्रृंगार । करौ अनुरागै = प्रेम करो । सयानप =