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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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१८ रसखान-ग्रन्थावली

बाह्य साक्ष्य रसखान से सम्बंधित बाह्य साक्ष्य के आधार पर तीन कृतियां विशेष रूप से उल्लेख्य हैं—दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता, मूल गुसाईं चरित और भक्तमाल । १. दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता—इस कृति मे वैष्णव-सम्प्रदाय के २५२ प्रमुख कवियो का परिचय है । यद्यपि यह परिचय पूर्ण तथा इतिहास- सगत नही है, फिर भी उसे एकदम निराधार अथवा काल्पनिक नही कहा जा सकता । इसमे ऐसे अनेक तथ्य मिलते हैं जिससे सम्वद्ध कवि के विषय मे बहुत- कुछ ज्ञातव्य बातो का बोध हो जाता है। इस कृति की २१८ वी वार्ता रस- खान से सम्बंधित है, जो इस प्रकार है-- 'अब श्री गुसाई जी के सेवक रसखान पठान दिल्ली मे रहते तिनकी वार्ता । सो दिल्ली मे एक साहूकार रहतो हतो । सो वा साहूकार को बेटा बहुत सुन्दर हतो । वा छोरा सो रसखान को मन बहुत लग गयो । वाही के पाछे फिर्यो करै और वाको झूँठो खाय और आठ पहर वाही की नौकरी करै । पगार कछू लैवे नही, दिन रात वाही मे आसक्त रहै । दूसरे बडी जात के रसखान की निन्दा बहुत-बहुत करते हते । पर रसखान काहू की सुनते नही हते और आठ पहर वा साहूकार के बेटा मे चित्त लग्यो रहतो । एक दिना चार वैस्नव मिलकै भगवत-वार्ता करते हते । करते-करते ऐसी बात निकसी जो प्रभु मे ऐसो चित्त लगावनो जैसो रसखान को चित्त साहूकार के बेटा मे लग्यौ है । इतने मे रसखान वा रस्ता निकस्ये, बिनने यह बात सुनी । तब रसखान ने कही जो तुम मेरी कहा बात करो हौ । तब वैस्नव ने जो बात हती सो कही । तब रसखान बोले, प्रभु को सरूप दीखै तो चित्त लगाइये । तब वा वैस्नव न श्रीनाथ जी को चित्र दिखायो । सो देखत ही रसखान ने वो चित्र ले लियो, और मन मे ऐसो संकल्प कर्यो जो ऐसो सरूप देखनो जब अन्न खाना और उहाँ सूँ घोडा पै बैठकै एक रात मे वृन्दावन आयो और सबरे दिन सब मदिरन मे भेष बदल कै फिर्यो और सब मदिरन मे दरसन किये पर वैसे दरसन नही भये । तब गुपालपुर मे गयो और भेस बदलकै श्री- नाथ जी के दरसन करने कूँ गयो । तब सिंघमौरिया ने भगवदिच्छा सूँ वाके चिन्ह बड़ी जातवारे के पहिचाने । तब वाकू धक्का मार निकास दियो,