रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
पृष्ठ 39, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ें२० रसखान-ग्रन्थावली इस उद्धरण से यह ज्ञात होता है कि रसखान ने तीन वर्ष तक, अर्थात् संवत् १६३४ से १६३७ तक, यमुना किनारे 'रामचरितमानस' की कथा का श्रवण किया था। चाहे 'मूल गुसाईं चरित' प्रामाणिक हो, अथवा अप्रामाणिक, पर यह कहना अनुपयुक्त नहीं कि इससे रसखान की धर्म के प्रति उदारता का पता चलता है। यद्यपि ये मूलतः कृष्ण-भक्त है, पर अन्य धार्मिक सम्प्रदायो के प्रति, तुलसी की भाँति, इनकी पूज्य दृष्टि है। तभी तो ये जिस श्रद्धा से कृष्ण की स्तुति करते हैं, उसी श्रद्धा से शिव और गंगा की महिमा का भी गुणगान करते हैं। ३. भक्तमाल—वार्त्ता-साहित्य मे भक्तमाल का जितना संवर्द्धन हुआ है इतना और किसी कृति का नही हुआ। यही कारण है कि समय-समय पर अनेक कवियो ने भक्तमाल की रचना की है, जैसे-भक्तमाल प्रसग, भक्तमाल प्रदीपन, भक्तमाल उत्तरार्द्ध, नवभक्तमाल आदि। भक्तमाल के सर्वप्रथम लेखक नाभादास माने जाते है। नाभादासकृत 'भक्तमाल' मे संवत् १६४३ तक के कृष्ण-भक्तो का ही उल्लेख है, पर रसखान के विषय मे कुछ नही कहा गया है। इसका कारण यह हो सकता है कि जब तक रसखान राजनीतिक कारणो से गुप्त जीवन यापन कर रहे होगे और इसीलिए कृष्ण-भक्तो मे इन्हे इतनी ख्याति प्राप्त न हुई होगी कि ये 'भक्तमाल' मे स्थान पा सके। 'भक्तमाल' पर अनेक टीकाएँ भी लिखी गई है। वस्तुत ये टीकाएँ न होकर ग्रन्थ का संवर्द्धन ही कही जा सकती हैं, क्योकि जैसे-जैसे कृष्ण-भक्तो की सख्या बढती गई, वैसे ही टीका के नाम पर इस कृति मे कृष्ण-भक्तो का समावेश होता गया। सवत् १७४४ मे प्रियादास जी के पौत्र वैष्णवदास ने 'भक्तमाल-प्रसग' नामक टीका के द्वारा इस कृति का संवर्द्धन किया और तब उन्होने रसखान को भी कृष्ण-भक्तो मे सम्मिलित कर लिया। 'भक्तमाल-प्रसंग' मे रसखान-विषयक प्रमाण इस प्रकार है— 'पातस्याह् न देखी तुरक कंठी पैरन लगे। तब रसखान बुलाए। देखे तो सो कंठी नार मे परी है। तब पूंछी रसखान, कंठी क्यो राखे है ? तब ये बोले—हजरत ! काठ की नाव पै पत्थर तिरै याते मै राखी है। ये काठ है, मै पत्थर हों। तब कही—भले राखो, परन्तु इतेक तो हिन्दू हू नाही राखे। तद रसखान बोल्यो—वे हलके है। मै भारी पत्थर हों।'