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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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समीक्षा भाग २१ यद्यपि इस कंथा का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नही मिलता, परन्तु यह जरूर मिलता है कि मुगल राजाओ ने कंठी-माला धारण पर रोक लगाई हुई थी। यह रोक गोस्वामी गोकुलनाथ जी के प्रयास से जहाँगीर ने समाप्त की। इस विषय पर तत्कालीन अनेक कवियो की उक्तियाँ मिलती है। १. 'जयति विट्ठल सुवन, प्रगट वल्लभ बली, प्रबल पन करि तिलक माल राखी।' —हरिराम जी २ 'माला तिलक न तजी कबहू, परी जदपि पुकार।' —कल्याणदास ३. 'बिट्ठलेस के सपूत गोकुलेस के हुलास, माल राखि सौ कलेस काहु मे न राख्यो है।' —प्रसिद्धि कवि प्रसिद्धि कवि ने तो इस विषय पर एक प्रबंधकाव्य की ही रचना कर डाली थी। इन उक्तियो से यह निष्कर्ष निकालना कठिन नही कि तत्कालीन मुगल उस मुगल को हीन दृष्टि से देखते थे जो हिन्दुओ की भाँति माला-तिलक धारण करता था। यह भी संभव है, हिन्दू भी सार्वजनिक स्थानो पर तिलक और माला धारण करके न जा सकते हैं। इसीलिए तो गोस्वामी गोकुलनाथ जी को उक्त आज्ञा को हटवाने के लिए काफी प्रयत्न करना पडा। इस पृष्ठभूमि मे यह अनुमान लगाना भी असंगत नही है कि कंठी धारण करने के कारण रसखान को भी अनेक यातनाओं का सामना करना पडा होगा। वे यातनायें चाहे राजा की ओर से हो, या कट्टर पथी मुसलमानो की ओर से। 'भक्तमाल-प्रदीपन' मे रसखान से सम्बद्ध जहां अनेक अन्य कथाओ का उल्लेख है, वहाँ यह कंठी वाली वार्ता भी पाई जाती है। 'भक्तमाल प्रदीपन' की कथा इस प्रकार है— 'रसखान जी परम भक्त भगवत के हुए। पहिले मुसलमान थे। बगरज तवाफ़ (परिक्रमा की इच्छासे) भावः (मक्का-स्थित एक मंदिर जिसे मुसल- मान ईश्वर का घर मानते हैं।) जो बिंद्रावन मे पहुँचे तो पहले जन्मो के