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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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२८ रसखान-ग्रन्थावली उसके अलौकिकत्व का प्रदर्शन भी करते रहे हैं। कृष्णकाव्य की यह प्रमुख विशेषता है। सूरदास ने विस्तारपूर्वक कृष्ण के अलौकिकत्व का वर्णन किया है। उदाहरण के लिए यह पद प्रस्तुत है— 'चरन गहे अंगुठा मुख मेलत । नद-घरनि गावति, हलरावति, पलना परिहरि मेलत । जे चरनारविंद श्री-भूषन, उर तैं नेकु न टारति । देखौ धौं का रस भरतनि को, सुर-मुनि करत विषाद । सो रस है मोहू कौं दुरलभ, तातै लेत स्वाद । उछरत सिंधु, धराधर काँपत, कमठ पीठ अकुलात । सेष सहसफन डोलन लागे, हरि पीवत जब पाइ । बढ्यौ वृक्ष वट सुर अकुलाने, गगन भयौ उत्पात । महा प्रलय के मेघ उठे करि, जहाँ-तहाँ आघात । करुना करी, छाँटि पग दीन्हौं, जानि सुरन मन त्रास । सूरदास प्रभु असुर-निकन्दन, दुष्टनि के उर त्रास ॥' स्वच्छन्द-काव्यधारा के कवि भी इस प्रवृत्ति से उन्मुक्त नही हो सके है। घनानंद कृष्ण के अलौकिकत्व का स्पष्ट संकेत देते हुए लिखते हैं— 'तोहि सब गावै एक तोही को बतावै वेद, पावै फल ध्यावै जैसी भावनानि भरि रे । जल-थल व्यापी सदा अंतरजामी उदार, जगत मे नाव जान राय रह्यौ परि रे । एते गुन लाय हाय छाय घनआनद यौँ, कैधो मोहि दीस्यो निरगुन ही उघरि रे । जरौ विरहागिनि मैं करौं हाँ पुकार कासो, दई गयी तू हूँ निरदई ओर ढरि रे ॥' रसखान ने भी इस प्रवृत्ति का पालन किया है। कृष्ण के अलौकिकत्व का प्रतिपादन करने वाले इनके आठ छंद उपलब्ध होते है जिनमें बताया गया है कि जिस कृष्ण का जप शंकर जैसे महादेव करते है, जिसका ध्यान करके ब्रह्मा अपने धर्म मे वृद्धि करते है, जिस पर देव, किन्नर और पृथ्वी पर रहने वाली स्त्रियाँ अपने प्राणो को न्योछावर करके सजीवता प्राप्त